संगीतकार अनिल बिस्वास

अनिल बिस्वास का जन्म पूर्वी बंगाल के बोरिसाल में 7 जुलाई 1914 को हुआ। वे बचपन से ही अच्छे गायक और तबलावादक थे। चार साल की उम्र से वे गाने लगे थे। किशोर उम्र में देशभक्ति जागी और स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। जेल गए और यातनाएँ सही। 16 साल की उम्र में नवंबर 1930 में कलकत्ता में महान बाँसुरी वादक पन्नालाल घोष के घर शरण ली। काजी नजरूल इस्लाम के कहने पर मेगा फोन रिकॉर्ड कंपनी में काम किया। उनका पहला रिकॉर्ड उर्दू में जारी हुआ था। यहीं पर उनकी मुलाकात कुंदनलाल सहगल और सचिन देव बर्मन से हुई थी। हीरेन बोस के साथ मुंबई आए और 26 साल संगीत सृजन किया। अनिल बिस्वास एक अकेले ऐसे बंगाली संगीतकार हैं जो पंजाबी फिल्म में पंजाबी, गुजराती फिल्म में गुजराती, मुगल पृष्ठभूमि की फिल्म में हिंदुस्तानी संगीत देने में माहिर थे। वे कीर्तन, जात्रा और रवीन्द्र संगीत के अलावा भी हिन्दुस्तानी संगीत को बखूबी जानते हैं जिनका इस्तेमाल उन्होंने अपने संगीत में किया।

श्री बिस्वास  ने 1943 में प्रदर्शित फिल्म ष्किस्मतष् में अद्भुत संगीत देकर अपने करियर को नया मोड़ दिया और कभी पीछे मुड़ के नहीं देखा । मिलन , ज्वारभाटा ,लाड़ली, अरमान, आरजू, अनोखा प्यार,  छोटी छोटी बातें,  सौतेला भाई जैसी कई उनके संगीत से सजी अविस्मरणीय फिल्में हैं। 1935 से 1965 तक तीस साल के संगीत सफर में अनिल दा ने हिंदी सिनेमा के संगीत में कई नए आयाम जोड़े। प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत के उस दौर में विश्वास ने पहली बार हिंदी सिनेमा को 12पीस आर्केस्ट्रा और वेस्टर्न सिंफनी से जोड़ा। दूर हटो ए दुनिया वालो हिन्दुस्तान हमारा है और दिल जलता है तो जलने दे जैसे अनगिनत मशहूर गानों को सुर देने वाले जाने माने संगीतकार अनिल बिस्वास  ने 1935.1965 तक भारतीय सिनेमा जगत को कई खूबसूरत धुनें दी। उनके संगीत निर्देशन में मशहूर गायक मुकेशण् तलत महमूदण् लता मंगेशकरण् बेगम अख्तर ण्अमीर बाई कर्नाटकी जैसी हस्तियों ने गाने गाये थे। अनिल विश्वास का 89 साल की उम्र में बीमारी के कारण दिल्ली में 31 मई 2003 को निधन हो गयाण् अब वे हमारे बीच नहीं हैंए लेकिन उनकी संगीत धरोहर संगीतप्रेमियों के लिए प्रकाश स्तंभ के समान है।