13-09-2017

देश के विभिन्न समाचार पत्रों ने विविध विषयों पर संपादकीय लिखे हैं और साथ ही कुछ सुर्खियां भी ध्यान आकर्षित करती हैं। आज समाचार पत्रों ने अलग-अलग खबर को अपनी सुर्खी बनाया है। जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे की भारत यात्रा के महत्व को कुछ अखबारों ने प्रमुखता से दिया है। दैनिक भास्कर लिखता है- तीन साल में ग्यारहवीं बार मिलेंगे मोदी और शिंजो, चीन की सड़क परियोजना वन बेल्ट- वन रोड का जवाब एशिया अफ्रीकी कोरीडोर से। सिर्फ बुलेट ट्रेन तक सीमित नहीं है यात्रा, आर्थिक और सामरिक मोर्चे से जुड़े कई करार होंगे।

जनसत्ता की अहम खबर है- पोखरण में परीक्षण के दौरान क्षतिग्रस्त हो गई एम-777 तोप। भारतीय सेना और अमरीकी सरकार की संयुक्त टीम कर रही है घटना की जांच।

राहुल का वार, स्मृति का पलटवार- अमरीका के बर्कले विश्वविद्यालय में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का भाषण और सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी की उस पर घेराबंदी- पंजाब केसरी सहित अधिकांश अखबारों की सुर्खी है। बकौल दैनिक जागरण राहुल ने कहा वंशवाद से चल रहा देश। दैनिक ट्रब्यून ने भाजपा का बयान दिया है- लोकतंत्र में वंशवाद की जगह नहीं। दैनिक भास्कर ने राहुल गांधी के हवाले से लिखा है- कांग्रेस पार्टी को अहंकार हो गया था इसलिए हारे 2014 का चुनाव।

खुशखबरी शीर्षक से केन्द्रीय मंत्रिमंडल के फैसलों पर भी अखबारों की नज़र है। हिन्दुस्तान ने बताया है कि केन्द्रीय कर्मचारियों का महंगाई भत्ता एक फीसदी बढ़ा। निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए बीस लाख रुपये तक की ग्रेच्युटी राशि कर मुक्त होगी।

पचास हजार फ्लैट तीन माह में ग्रहकों को दें बिल्डर। अमर उजाला के अनुसार- उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिल्डरों पर कसा शिकंजा, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना प्राधिकरण के आवंटियों को मिलेगी बड़ी राहत।

डेढ़ साल बाद केरल के फादर टॉम को इस्लामिक स्टेट के चंगुल से छुड़ाने की खबर दैनिक ट्रिब्यून सहित लगभग सभी अखबारों में सचित्र प्रकाशित है।  

‘परिवारवाद पर मुहर’ शीर्षक से दैनिक जागरण अपने संपादकीय में लिखता है कि अमेरिका यात्रा के दौरान बर्कले स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में राहुल गांधी ने परिवारवाद की राजनीति का बचाव करते हुए जिस तरह उस पर मुहर लगाई और यहां तक कह दिया कि भारत में ऐसे ही चलता है उससे उन्होंने जाने-अनजाने न केवल अपनी, बल्कि कांग्रेस और साथ ही भारतीय राजनीति की भी गलत छवि पेश करने का काम किया। यह आश्चर्यजनक है कि उन्होंने अखिलेश यादव, एमके स्टालिन और ऐसे ही कुछ अन्य नेताओं का उदाहरण देते हुए यह कहने में भी संकोच नहीं किया कि अभिषेक बच्चन और मुकेश अंबानी भी परिवारवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी मानें तो इन्फोसिस में भी ऐसी ही परिपाटी की नींव पड़ चुकी है। ऐसा लगता है कि राहुल गांधी के लिए सिनेमा, उद्योग जगत और राजनीति में कोई फर्क नहीं या फिर वह एक राजनेता के तौर पर अपने को उतना ही जवाबदेह मानते हैं जितना कि सिनेमा और उद्योग जगत के लोगों को। यह समझना कठिन है कि वह यह क्यों नहीं देख सके कि राजनीति में तमाम नेता ऐसे हैं जो कि परिवारवाद के बगैर अपनी जगह बनाने और छाप छोड़ने में सफल रहे हैं।

राहुल गांधी ने अपने संबोधन में अन्य अनेक मसलों पर भी अपने विचार व्यक्त किए, लेकिन ऐसा लगता है कि उन्हें यह ख्याल नहीं रहा कि अमेरिका में वह भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, न कि केवल कांग्रेस का।

यह मान्यता तो एक तरह से सामंती सोच की परिचायक है कि जो काम कांग्रेस कर सकती है वो दूसरे दल नहीं कर सकते। राहुल गांधी विपक्ष को नेता की हैसियत से मोदी सरकार के बारे में अपने हिसाब से अपनी बात कहने के अधिकारी हैं, लेकिन बेहतर होगा कि वह राष्ट्रीय महत्व के मसलों पर देश और विशेष रूप से विदेश में विचार व्यक्त करते समय और अधिक सतर्कता एवं परिपक्वता का परिचय दें।

‘सकारात्मक संदेश’ शीर्षक से हिन्दुस्तान अपने संपादकीय में लिखता है कि मिशन कश्मीर पर निकले केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कश्मीर में जो कुछ कहा और किया, उसका स्वागत होना चाहिए। राजनाथ सिंह ने सुरक्षा बलों पर पथराव करने के मामले में पहली बार पकड़े जाने वाले युवकों के साथ नरमी बरतने का संकेत देकर जो संदेश देना चाहा है, उसके दूरगामी नतीजे होंगे। संदेश बहुत साफ है कि हालात से गुमराह होकर पथराव में शामिल युवकों को अलग करके क्यों नहीं देखा जाना चाहिए ? उन्होंने ऐसे युवकों को जेल नहीं, बल्कि सुधार गृह भेजने का सुझाव देकर बड़ा संदेश दिया है, जहां उनकी बात तो सुनी ही जाए, उन्हें यह समझने का मौका भी मिले कि वे किस तरह अलगाववादियों का खिलौना बनकर अपने मकसद से दूर हो गए। गृह मंत्री की कश्मीर यात्रा के संदेशों और संकेतों से माना जा सकता है कि सरकार घाटी में कुछ नया और सकारात्मक संदेश देना चाहती है। घाटी की समस्या के समाधान में जरा सा भी योगदान दे सकने वाले किसी भी इंसान से मिलने की गृह मंत्री की तत्परता में भी बड़ा संदेश है। यह नई उम्मीद जगाएगा।

जरूरत अटल बिहारी वाजपेयी की ‘हीलिंग टच पॉलिसी’ को समझने की है। यह समझने की है कि युवा चाहे कश्मीर का हो या पंजाब का, हमेशा इसलिए झांसे में आया कि उसकी बातें और मुश्किलों पर कभी सीधी बात ही नहीं हुई। अगर वह आंदोलन में कूदा, तो अपराधी समझकर उसे लाठी-गोली मिली या जेल में ठूंस दिया गया। सोचने की कोशिश ही नहीं हुई कि हालात और भटकाव के शिकार युवा व अपराधियों को अलग-अलग देखे जाने की जरूरत है। देर से ही सही, कश्मीर का ताजा सच भी यदि जुमलेबाजी बनकर नहीं रहा, तो कहने में संकोच नहीं कि ऐसे प्रयास गेम चेंजर साबित हो सकते हैं। लेकिन यह सब रातोंरात या एक दिन में नहीं होगा। यह लंबी प्रक्रिया का मामला है और लगातार चलना होगा। दूर तक संदेश तभी जा पाएगा, असर भी तभी होगा। हाल की कार्रवाइयों से घाटी में आतंकवाद के हौसले पस्त हुए हैं। बंदूक के साथ मरहम की यह नीति चल पड़ी, तो दिन को बदलते देर नहीं लगेगी। सब कुछ इसी सोच और समझदारी से आगे बढ़ा, तो घाटी की हरियाली बढ़ाने वाली नई कोंपलें फूटेंगी।