12.10.2017

देश के विभिन्न समाचार पत्रों ने विविध विषयों पर संपादकीय लिखे हैं और साथ ही कुछ सुर्खियां भी ध्यान आकर्षित करती हैं। समाचार पत्रों ने अलग-अलग खबर को अपनी सुर्खी बनाया है।

अर्थव्यवस्था को धार देने के लिये प्रधानमंत्री मोदी के पंचरत्नों ने चुने दस सूत्र–प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की कल हुई पहली बैठक में अर्थव्यवस्था को गति देने के उपायों पर चर्चा राजस्थान पत्रिका सहित अधिकांश अखबारों की प्रमुख खबर है। जनसत्ता ने परिषद के अध्यक्ष के हवाले से लिखा है–देश में रोज़गार के बारे में कोई सटीक आंकड़ा नहीं है।

राष्ट्रीय सहारा ने प्रधानमंत्री के वक्तव्य को प्रमुखता दी है। नानाजी देशमुख के जन्मशती समारोह में पी.एम. ने दिया गरीबोत्थान और ग्रामोदय पर ज़ोर। बोले–गांव को गरीबी से दिलाएंगे मुक्ति।

केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक फैसले पर राजस्थान पत्रिका की सुर्खी है–सात लाख से अधिक शिक्षकों को सातवां वेतनमान, पचास हज़ार रुपये तक का लाभ।

अमर उजाला ने उच्चतम न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला शीर्षक से लिखा है–नाबालिग पत्नी से संबंध दुष्कर्म। दैनिक भास्कर लिखता है–पत्नी को सालभर में करनी होगी शिकायत, सभी धर्मों पर लागू होगा फैसला।

कालेधन पर गठित विशेष जांच दल आरटीआई के दायरे में। हिंदुस्तान की खबर है–केंद्रीय सूचना आयोग ने एसआईटी को सूचना के अधिकार कानून के तहत सार्वजनिक प्राधिकार करार दिया है।

जम्मू-कश्मीर के बांडीपोरा में दो आतंकी ढेर और वायुसेना के दो गरुड़ कमांडो के शहीद होने की खबर दैनिक ट्रिब्यून सहित सभी अखबारों में है।

दैनिक भास्कर की सुर्खी है–पेरिस के एफिल टॉवर की तरह एक करोड़ साठ लाख रंगों के मिश्रण से हर रोज़ सौर ऊर्जा से चमकेगा राष्ट्रपति भवन, नॉर्थ और साउथ ब्लॉक।

पंख फैलाए तो बन गयी अमरीका की राजदूत–दैनिक जागरण ने बताया है कि कल अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस के उपलक्ष्य में बारह विदेशी दूतावासों और उच्चायोगों की कमान एक दिन के लिये भारतीय लड़कियों ने संभाली।

नवभारत टाइम्स अपने संपादकीय में  ‘बाल विवाह पर हथौड़ा’ शीर्षक से लिखता है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना रेप समझा जाएगा। कोर्ट के अनुसार नाबालिग पत्नी इस घटना के एक साल के अंदर शिकायत दर्ज कर सकती है। निश्चय ही यह फैसला स्त्री सशक्तीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे समाज में एक व्यापक बदलाव की शुरुआत हो रही है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब वहां विवाह संबंध के अंतर्गत पत्नी की मर्जी के बगैर बनाए गए यौन संबंध को अपराध घोषित करने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई हो रही है और समाज में सहमति की उम्र को लेकर बहस छिड़ी हुई है। इस फैसले का सीधा प्रभाव यह होगा कि मुकदमे और सजा के डर से लोग बच्चियों को अपनी बहू बनाने में हिचकेंगे। देश के कई इलाकों में आज भी बाल विवाह प्रचलित है, खासकर लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर दी जाती है। 2016 के नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक देश में तकरीबन 27 फीसदी लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र के पहले हो जाती है। 2005 के नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में यह आंकड़ा तकरीबन 47 फीसदी था। यानी सिर्फ दस वर्षों में 18 साल से कम उम्र वाली लड़कियों की शादी में 20 फीसदी की गिरावट आई है। कानून के डर से यह प्रक्रिया अब और तेज होगी। अभी तक पर्याप्त कानून न होने की वजह से बाल विवाह रोकने के प्रयास कमजोर पड़ जाते थे। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश मानते हुए राज्य सरकारों को अब बाल विवाह रोकने के लिए कठोर कदम उठाने चाहिए।

जनसत्ता अपने संपादकीय में ‘तेल की धार’ शीर्षक से लिखता है कि डीजल और पेट्रोल की कीमतों में अतार्किक बढ़ोतरी पर चौतरफा विरोध के बीच गुजरात सरकार ने दिवाली की सौगात के तौर पर वैट में चार प्रतिशत की कटौती कर दी है। निश्चय ही इस फैसले से लोगों को कुछ राहत महसूस होगी। गुजरात की तर्ज पर हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र सरकार ने भी वैट दरों में कटौती का फैसला किया है। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा के चुनाव नजदीक हैं, इसलिए विपक्षी दल स्वाभाविक रूप से इस फैसले को चुनाव से जोड़ कर देख रहे हैं।

इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत अब तक के सबसे निचले स्तर पर है, पर भारतीय बाजार में पेट्रोल और डीजल का दाम उस समय से भी अधिक है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत सबसे ऊंचे स्तर पर थी। इसलिए लगातार सवाल उठते रहे हैं कि डीजल और पेट्रोल की कीमतें तय करने के मामले में पारदर्शिता क्यों नहीं बरती जाती। राज्य सरकारों के तेल पर मनमाना कर वसूलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के व्यावहारिक उपाय क्यों नहीं किए जाते। केंद्र को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर किन वजहों के चलते वह तेल की कीमतों को संतुलित नहीं कर पा रही। वैसे ही लोगों पर इतने तरह के करों और उपकरों का बोझ है, तेल की कीमतें बेलगाम छोड़ कर रोजमर्रा के खर्च बढ़ाने से सरकार को और असंतोष का सामना करना पड़ेगा। इसलिए इस मामले में मामूली कटौतियों का सहारा लेने के बजाय व्यावहारिक कदम उठाने की जरूरत है।