14-11-2017

देश के विभिन्न समाचार पत्रों ने विविध विषयों पर संपादकीय लिखे हैं और साथ ही कुछ सुर्खियां भी ध्यान आकर्षित करती हैं। आज समाचार पत्रों ने अलग-अलग खबर को अपनी सुर्खी बनाया है। फिलीपिंस की राजधानी मनीला में प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी और अमरीकी राष्‍ट्रपति डॉनल्‍ड ट्रम्‍प के बीच मुलाकात की खबरें सभी अखबारों में हैं। हिन्‍दुस्‍तान ने श्री नरेन्‍द्र मोदी के इस बयान को छापा है- भारत अमरीका मिलकर एशिया को बदलेंगे। दैनिक जागरण लिखता है- फिर मिले हाथ मोदी – ट्रम्‍प मुलाकात में साझी दोस्‍ती को नया आयाम देने की सहमति। आसियान व्यापार और निवेश सम्‍मेलन में प्रधानमंत्री का यह बयान कि भारत को वैश्विक विनिर्माण केन्‍द्र बनायेंगे राष्‍ट्रीय सहारा में है। शिखर सम्‍मेलन के उदघाटन सत्र में फिलीपींस के कलाकारों द्वारा रामायण पर आधारित मनमोहक संगीतमय प्रस्‍तुति को भी अखबारों ने प्रमुखता से दिया है।

दैनिक जागरण ने ऑपरेशन क्‍लीन मनी शीर्षक से लिखा है कि आयकर विभाग के रडार पर 23 लाख बैंक खाते। पत्र लिखता है- नोटबंदी के दौरान भारी भरकम रकम जमा कराने वाले खातों की अब सख्‍ती से जांच की जा रही है।

जनसत्‍ता ने आज विश्‍व मधुमेह दिवस पर लिखा है – बढ़ता खर्चा मधुमेह की दवाईयों का, इन्‍सुलिन की बिक्री नौ साल में पांच गुना बढ़ी। हिन्‍दुस्‍तान ने सलाह दी है कि खानपान और जीवनशैली में बदलाव लाकर इस बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

दैनिक भास्‍कर ने डेटा रिसर्च करने वाली एक संस्‍था के इस अध्‍ययन को प्रमुखता से दिया है कि डिजिटल के बजाय प्रिंट की खबरों पर ज्‍यादा भरोसा करते हैं लोग।

नवभारत टाइम्स अपने संपादकीय में ‘कूटनीति का चौका’ शीर्षक से लिखता है कि फिलीपींस की राजधानी मनीला में रविवार को हुई भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान की बैठक एक नई शुरुआत है। इन चारों देशों में जो आपसी सहमति कायम हुई है, उसका भारत-प्रशांत क्षेत्र पर गहरा असर पड़ेगा और धीरे-धीरे यह गठजोड़ दुनिया के शक्ति समीकरण पर गहरा असर डालने लगेगा। इस बैठक में भारत-प्रशांत क्षेत्र को मुक्त, खुला, समृद्ध और समावेशी बनाने के उपायों पर बातचीत हुई। आतंकवाद और प्रसार जैसी साझा चुनौतियों के समाधान के अलावा आपसी संपर्क बढ़ाने के उपायों पर भी विचार व्यक्त किए गए। इस बैठक की अवधारणा कोई नई नहीं है। वैसे अमेरिका और भारत के चीन के साथ अच्छे व्यापारिक संबंध हैं लेकिन कूटनीतिक मोर्चे पर दोनों के लिए चीन सबसे बड़ी चुनौती रहा है। इसलिए अमेरिका उसे चारों ओर से घेर देना चाहता है। बहरहाल, इस क्षेत्र में हमारे अपने हित तो हैं ही इस क्षेत्र के देशों जापान, वियतनाम, साउथ कोरिया और फिलीपींस से हमारे रक्षा और व्यापारिक संबंध भी हैं। अपनी रक्षा के लिए किसी भी मोर्चे में शामिल होना किसी भी दृष्टि से गलत नहीं है। भारत ने साफ कर दिया है कि इसका मकसद व्यापक है, यह किसी एक देश के खिलाफ नहीं है। भारत की ऐक्ट ईस्ट नीति इस क्षेत्र में हमारे कार्यों की आधारशिला है और इसी आधार पर हम आगे बढ़ना चाहते हैं। देखना है यह भागीदारी आगे कैसा रूप लेती है।

हिंदुस्तान अपने संपादकीय में ‘आस्था और पर्यावरण’ शीर्षक से लिखता है कि प्रदूषण और पर्यावरण बदलाव की समस्या जैसे-जैसे गहराती जा रही है, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी राष्ट्रीय हरित अधिकरण के हर फैसले पर चर्चा इन दिनों काफी बढ़ गई है। इन फैसलों से विवाद भी खडे़ हुए हैं और इनके लिए अधिकरण की तारीफ भी हुई है। हरित अधिकरण ने ऐसा ही एक फैसला वैष्णो देवी तीर्थ को लेकर दिया है। अधिकरण ने कहा है कि एक दिन में 50,000 से ज्यादा यात्रियों को त्रिकुता पर्वत के शिखर पर बने वैष्णो देवी तीर्थ पर नहीं जाने देना चाहिए। अगर किसी दिन यात्रियों की संख्या ज्यादा हो जाती है, तो बाकी यात्रियों को पर्वत के आधार क्षेत्र कटरा में ही रोक लिया जाए, या फिर उन्हें आधी ऊंचाई पर बने अद्र्धकुमारी से आगे न जाने दिया जाए। जम्मू-कश्मीर के इस तीर्थ पर जाने वाले यात्रियों की संख्या पिछले कुछ साल में तेजी से बढ़ी है। अधिकरण ने जिस आधार पर यह फैसला दिया है, वह काफी महत्वपूर्ण है। कूडे़ के निस्तारण और सीवेज ट्रीटमेंट को अगर हम पैमाना बनाएं, तो हमारे बहुत सारे महानगर और नगर इस पर खरा नहीं उतरेंगे। आबादी के लिहाज से देश के ज्यादातर शहरी क्षेत्रों में ये दोनों ही व्यवस्थाएं नाकाफी हैं। दिक्कत यह भी है कि इन व्यवस्थाओं की क्षमता बढ़ाने के लिए भी कुछ नहीं हो रहा। लेकिन इस फैसले का असली महत्व यह है कि अधिकरण ने उन जगहों से पर्यावरण की सुध ली है, जिन्हें आस्था का केंद्र मानकर अक्सर छोड़ दिया जाता है। हमारे बहुत सारे तीर्थ ऐसी जगहों पर हैं, जो पर्यावरण की दृष्टि से काफी संवेदनशील हैं। आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन हमें उस पर्यावरण का ख्याल भी रखना होगा, जो इन आस्था के केंद्रों को सदियों से अपने भीतर संजोता आया है। बेतरतीब निर्माण और बड़ी संख्या में लोगों के आने-जाने से क्या त्रासदी आ सकती है, इसे हम केदारनाथ त्रासदी के वक्त देख ही चुके हैं। सिर्फ आस्था के केंद्रों ही नहीं, पर्यटन केंद्रों के मामले में भी यही तरीका अपनाना बेहतर रहेगा। उम्मीद है कि इस फैसले से अन्य जगहों के लिए भी सीख ली जा सकेगी।