07.12.2017

देश के विभिन्न समाचार पत्रों ने विविध विषयों पर संपादकीय प्रकाशित किये हैं और साथ ही कुछ सुर्खियां भी ध्यान आकर्षित करती हैं। अधिकतर अखबारों ने पहले पन्ने पर रिजर्व बैंक की द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा की मुख्य बातों के साथ अपने-अपने आकलन दिए हैं। जनसत्ता लिखता है- नीतिगत ब्याज दर में बदलाव नहीं। केंद्रीय बैंक ने कहा- अर्थव्यवस्था की स्थिति सुधार की ओर। इकोनोमिक टाइम्स का शीर्षक है- रिजर्व बैंक ने नहीं घटाई ब्याज दरें, महंगाई का हवाला दिया।

अखबारों ने अयोध्या मामले पर कपिल सिब्बल के बयान के बाद सत्तापक्ष और विपक्ष में जुबानी जंग को भी अहमितयत दी है। हरिभूमि ने बॉक्स में विस्तार से लिखा है- अयोध्या विवाद पर चौतरफा घिरे कपिल सिब्बल। दैनिक भास्कर की पहली खबर है- सुन्नी बोर्ड ने कहा- सिब्बल हमारे वकील नहीं।

राष्ट्रीय सहारा ने सरकार के इस निर्णय को अहमितय दी है कि वीरता पुरस्कार विजेताओं को अब दोगुनी राशि दी जाएगी।

जनसत्ता ने सेना प्रमुख जनरल रावत के इस बयान को शीर्षक बनाया है कि हम धर्मनिरपेक्ष और जीवंत लोकतंत्र के माहौल में काम करते हैं, इसलिए सेना को राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए।

दैनिक भास्कर ने लिखा है – दिल्ली में प्रदूषण कम करने की कवायद में दिल्ली सरकार का अधूरा प्लान- नौ बार डांट खा चुकी दिल्ली सरकार से नाराज एनजीटी। राष्ट्रीय सहारा ने लिखा है- सम विषम लागू हुआ तो अब किसी को छूट नहीं।

अमर उजाला की बड़ी खबर है- राजधानी में धड़ल्ले से हो रहे हैं अवैध निर्माण, कानून ध्वस्त। हाईकोर्ट की फटकार। राष्ट्रीय सहारा ने लिखा है – सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में अवैध निर्माण को प्रदूषण की स्थिति का एक कारण बताया।

लगभग सभी अखबारों ने जांच कमेटी की रिपोर्ट में गुरूग्राम फोर्टिस अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही और गैरकानूनी तरीके अपनाने से बच्ची की मौत का जिम्मेदार ठहराने को महत्व दिया है। दैनिक भास्कर ने लिखा है – इलाज में लापरवाही, हर चीज में मुनाफाखोरी, फोर्टिस पर होगा केस।

दिल्ली एनसीआर में कल रात आए भूकंप के झटकों की खबर भी लगभग सभी अखबारों ने दी है। देशबंधु ने लिखा है – भूकम्प से थर्राया उत्तर भारत। नवभारत टाइम्स लिखता है – केंद्र रुद्रप्रयाग था। हरिभूमि ने लिखा है दस सैकेंड तक महसूस हुए झटके।

राजस्थान पत्रिका ने बीते साल कश्मीर में पत्थरबाजी के लिए चर्चित हुई अफशां के फुटबाल टीम कप्तान बनने की खबर को शीर्षक दिया है- जम्मू कश्मीर में बदलाव की बयार।

दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका ने प्रोत्साहन शीर्षक से पहले पन्ने पर लिखा है- केंद्र ने दलित से अंतर-जातीय विवाह पर ढाई लाख रुपये देने का प्रावधान किया।

‘विवाद की राजधानी’ शीर्षक से हिन्दुस्तान अपने संपादकीय में लिखता है कि दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक येरुशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता देने की मंशा जाहिर करके अमेरिका ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है। इसे लेकर दुनिया भर से जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, वे काफी तीखी हैं। कुछ देर के लिए अगर पश्चिम एशिया के देशों को छोड़ भी दें, तो फ्रांस जैसे नाटो में उसके सहयोगी देश ने भी इस मंशा का खुला विरोध किया है। बाकी दुनिया भी इसे लेकर काफी असहज दिख रही है। यह लगभग तय माना जा रहा है कि अगर ऐसा होता है, तो पश्चिम एशिया एक बार फिर बड़ी अशांति की ओर बढ़ने लगेगा। बेशक इससे इजरायल और यहूदी विश्व को किसी तरह की मानसिक संतुष्टि मिले, लेकिन इससे इजरायल की मुश्किलें भी बढ़ेंगी ही। फलस्तीनी उग्रवाद का तेवर और तीखा होना तो तय ही है, कई क्षेत्रीय समीकरण भी बदल जाएंगे। तुर्की ने पहले ही घोषणा कर दी है कि अगर ऐसा होता है, तो वह इजरायल से रिश्ते तोड़ लेगा, पूरी संभावना है कि जल्द ही मिस्र भी शायद यही करे। ऐसे भी कई देश हैं, जिनकी आपत्ति इस पर है कि इससे ठंडी होती दिख रही आग फिर से भड़क उठेगी। भारत समेत इन देशों का सैद्धांतिक रुख यह है कि इस तरह के विवाद आपसी बातचीत और सहयोग से निपटाए जाने चाहिए। लेकिन अमेरिका इसका रुख अपनी राजनयिक ताकत से बदल रहा है। इजरायल ही नहीं, यह पूरी दुनिया जानती है कि अगर अमेरिका का दूतावास तेल अवीव से येरुशलम में स्थानांतरित हो जाता है, तो उसे ही इजरायल की औपचारिक राजधानी का दर्जा मिल जाएगा। अमेरिका के मान्यता देते ही पश्चिम के कुछ देश भी इसी रास्ते को अपनाएंगे और तेल अवीव में बाकी बचे दूतावास मुख्यधारा से कटे हुए दिखाई देंगे। पर असल समस्या इससे भड़कने वाली आग की है।

‘फंसता हुआ गलियारा’ शीर्षक से नवभारत टाइम्स लिखता है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा जितनी तेज रफ्तार से फर्राटे भरता नज़र आ रहा था, अभी यह उतनी ही बाधाओं में फंसता दिख रहा है। पिछले डेढ़-दो महीनो में तीन रुकावटें इसमें देखने को मिली हैं। सबसे पहले पाक अधिकृत कश्मीर में डायमर-भीशा जल विद्युत परियोजना पर सवाल उठा। चीन ने इसमें अपना धन लगाने की जो शर्तें रखीं, उन्हें अपनी संसद में मंज़ूरी दिलाना पाकिस्तान सरकार को मुश्किल लगा। इसमें कर्ज़ अदायगी के लिए चीनी तुर्किस्तान को बिजली सप्लाई करने की बात थी, जिसमें पाकिस्तान के पल्ले कुछ भी नहीं पड़ना था। ऐसे में यह परियोजना रद्द करनी पड़ी, हालांकि इसकी औपचारिक घोषणा अब तक नहीं की गई है। इसके साथ एक मामला पेशावर-कराची रेलवे लाइन का निर्माण टालने का भी जुड़ा है। किसी भी देश का किसी अन्य देश में बड़े पैमाने की पूंजी लगाना कभी आसान नहीं होता और अगर मामला पूंजी लगाने वाले देश की रणनीतिक योजना से जुड़ा हो, उसका मूल प्रस्ताव दूसरे देश की तरफ से ना आया हो, तो मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। हाल में संपन्न चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पंचवर्षीय अधिवेशन में पूंजी की बर्बादी एक बड़ा मुद्दा बना। उसके बाद से चीन की वित्तीय संस्थाएं एक-एक युआन दांत से पकड़ने लगी हैं। पाकिस्तानी हुकुमत की सिरदर्दी इससे और बढ़ने वाली है।