आरबीआई ने प्रमुख दरों में नहीं किया बदलाव

भारत के रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति या एमपीसी ने अपना पांचवां द्वैमासिक नीति वक्तव्य जारी कर दिया है। इस समिति का नेतृत्व रिज़र्व बैंक के गवर्नर डॉक्टर उर्जित पटेल कर रहे हैं। यह जानना रोचक है कि शीर्ष बैंक ने दरों में कोई बदलाव नहीं करने का फैसला लिया है। एमपीसी में पुर्नख़रीद या रेपो दर में कोई बदलाव न करते हुए इसे 6 प्रतिशत रखा है और रिवर्स रेपो दर को 5.75 प्रतिशत लेकिन वर्तमान वित्त वर्ष की बची हुई अवधि के लिए स्फिति पूर्वानुमान को बढ़ाकर 4.3-4.7 प्रतिशत किया है।

एक वैधानिक और संस्थागत तंत्र स्थापित करने के लिए आरबीआई एक्ट 1934 के रूप में किए गए संशोधन के बाद मौद्रिक नीति समिति का गठन किया गया था ताकि एमपीसी के सदस्य नीति दरों का फैसला लें, न कि सिर्फ आरबीआई गवर्नर। नई मौद्रिक संरचना की दिशा में आरबीआई और भारत सरकार के द्वारा हस्ताक्षर किए गए दस्तावेज़ के अनुसार भारत में मैक्रो नीति निर्माण में प्रमुख संरचनात्मक सुधार के रूप में केन्द्रीय बैंक के लक्ष्य भी फिर से लिखे गए। इस संस्थागत सुधार के बाद आरबीआई का एक मात्र लक्ष्य मूल्य स्थिरता प्रबंधन है। तब से आरबीआई ने विनिमय दर प्रबंधन और स्फिति के साथ रोज़गार तथा विकास के बहुसंकेतक रवैये को छोड़कर मुद्रास्फिति लक्ष्यों पर ध्यान देना शुरू कर दिया है।

स्फिति मुख्य रूप से 4 प्रतिशत के सामान्य बिंदु पर नियंत्रण में रही और आर्थिक विकास में भी फिर से उछाल आया। इसीलिए एमपीसी ने तटस्थ मौद्रिक नीति को 6 प्रतिशत रखने का फैसला किया। सरकार ने जीएसटी, बैंक पुर्नपूंजीकरण पैकेज और कारोबार करने के माहौल को आसान बनाने की रैंकिंग बढ़ाने जैसे विभिन्न सुधारवादी उपाय किए। इन उपायों की वजह से एमपीसी ने वार्षिक जीवीए पूर्वानुमान वित्तवर्ष 2018 के लिए 6.7 प्रतिशत बनाए रखा। पांचवें द्वैमासिक मौद्रिक नीति वक्तव्य 2017-18 में आरबीआई ने कहा है कि 2017-18 के लिए वास्तविक जीवीए वृद्धि का आकलन अक्टूबर प्रस्ताव में 6.7 प्रतिशत बनाए रखा गया है। वैश्विक तेल मूल्यों में हाल ही में हुई वृद्धि को शामिल न करते हुए जोखिम के प्रति संतुलन बनाए रखने का प्रयास है। पांचवें द्वैमासिक मौद्रिक नीति वक्तव्य में आरबीआई ने वित्तीय गिरावट के प्रति चेताया भी है। यह गिरावट 178 मदों पर जीएसटी दर 28 प्रतिशत से कम होकर 18 प्रतिशत होने की वजह से अप्रत्यक्ष कर राजस्व में आने वाली कमी, उत्पादन शुल्क में आंशिक रूप से कमी और पैट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले वैट कर तथा राज्यों द्वारा कृषि ऋण को छोड़ने की वजह से हो सकती है। आरबीआई ने कहा कि वित्तीय गिरावट से स्फिति बढ़ सकती है।

एमपीसी रिपोर्ट में वैश्विक वित्तीय बाज़ारों के घटनाक्रम और अमरीका के फैड विशेष तौर से बॉन्ड से होने वाले मुनाफे के रुझान को ध्यान में रखते हुए दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। ऐसा करने से ब्याज दरों में विविधिता की वजह से विकसित देशों में पूंजी के स्तर में तेज़ी से बदलाव हो सकता है। हालांकि तटस्थ नीति बनाए रखने के आरबीआई के फैसले पर कुछ निराशा भी जताई गई है। इस संदर्भ में कहा गया है कि घरेलू मांग को बढ़ाने के लिए और आर्थिक विकास को तेज़ करने के उद्देश्य से निजी निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए नीति दरों को कम किया जाना ज़रूरी था। यह स्पष्ट है कि रैपो दर कम करने के बाद बैंक अपने जमा या ऋण दरों में बदलाव नहीं कर पाते। भारतीय अर्थव्यवस्था में नीति घोषणाओं का लाभ ब्याजदर व्यवस्था के प्रभाव पर भी निर्भर करता है। ऐसा मानना सही नही होगा कि असल में रैपो दर कम करने से आर्थिक वृद्धि तेज़ हो जाती है। इसीलिए आरबीआई गवर्नर डॉ. उर्जित पटेल द्वारा दरों में बदलाव न किया जाना एक सजग फैसला है।  आरबीआई गवर्नर ने कहा कि खाद्य और ईंधन मूल्यों से आपूर्ति पक्ष पर पड़ने वाले दबाव, इसका स्फितिकारी प्रभाव और जीवन स्तर की सामने आती लागत को ध्यान में रखकर दरों में बदलाव नहीं किया गया है।

एमपीसी नीति निर्णय कॉर्पोरेट जगत के रुझानों के अनुरूप रहा है। उन्होंने इस समाचार को सकारात्मकता के साथ स्वीकार किया। शीर्ष स्फिति संचालक शक्ति के दबाव और अमरीका के फैडरल बैंक की अध्यक्ष जैनेट येलेन के फैसले समेत वैश्विक वित्तीय बाज़ारों के रुझान का आऱबीआई के फैसले पर असर पड़ा और दरों को ज्यों का त्यों रखा गया। नवंबर के अंत में फैड निर्णय जारी करते समय सुश्री जेनेट येलेन ने संकेत दिया था कि फैड की ब्याज दरों में भविष्य में वृद्धि की जाएगी जिससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं में पूंजी प्रवाह पर इसका असर पड़ सकता है। इसीलिए आरबीआई ने सावर्जनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए पुर्नपूंजीकरण कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए दरों में कोई बदलाव नहीं किया। आशा है कि अब निजी निवेश और समग्र ऋण विकास में तेज़ी आएगी।

आलेख- डॉ. लेखा एस. चक्रबोर्ती, एसोसिएट प्रोफेसर, राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान

अनुवाद- नीलम मलकानिया