विषय- भारत ने अन्तरिक्ष के क्षेत्र में लगाया शतक

अंतरिक्ष में पीएसएलवी-सी 40 रॉकेट के जरिये 100 वाँ उपग्रह कार्टोसैट -2 एफ सफलतापूर्वक कक्षा मेंस्थापित करने के साथ ही शुक्रवार को भारत ने अन्तरिक्ष के क्षेत्र में उपग्रह प्रक्षेपण का शतक लगा लिया है। कार्टोसैट -2 एफ का सफल प्रक्षेपण भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का मनोबल बढ़ाने में अहम होगा। इसने पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) रॉकेट की विश्वसनीयता को और प्रबल किया। पीएसएलवी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के सबसे भरोसेमंद रॉकेट के रूप में उभरा है। हालांकिपीएसएलवी से बिना किसी बाधा के 39 सफल प्रक्षेपण किए हैं फिर भी इसरो ने इसकी एक बार की असफलता के बाद चार महीनों का समय लिया ताकि कुछ प्रमुख क्षेत्रों का अवलोकन कर उन्हें दुरुस्त किया जा सके।

दिलचस्प बात यह है कि पीएसएलवी-सी 39 की असफलता के कारणों में पाया गया कि चौथे चरण में रॉकेट का हीट शील्ड अलग नहीं हो सका जिससे रॉकेट के साथ-साथ इसमें जा रहा उपग्रह अंतरिक्ष के लिए कचरे से अधिक कुछ नहीं रहा। हालांकि इस मिसशन में भी पहले, दूसरे और तीसरे चरण तक सब कुछ सामान्य रहा था।

शुक्रवार का प्रक्षेपण कई अन्य कारणों के लिए भी महत्वपूर्ण रहा। अगस्त 2017 में अपने पिछले पीएसएलवी मिशन की विफलता के बाद चार महीनों में ही इसरो में इसकी वापसी हुई और इसने 710 किलोग्राम वज़नी कार्टोसैट -2 एफ को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया।

कार्टोसैट-2 एफ, कार्टोसैट श्रृंखला का सातवाँ उपग्रह है जिसे पृथ्वी के अवलोकन के लिए सन सिंक्रोनस ओर्बिट में स्थापित किया जाना था। इसका मुख्य उद्देश्य अच्छी रिज़ोल्यूशन वाले मानचित्र इकठ्ठा करना है। उपग्रह द्वारा भेजे गए चित्रों का इस्तेमाल कार्टोग्राफिक एप्लिकेशन, शहरी और ग्रामीण एप्लिकेशन, तटीय भूमि उपयोग और विनियमन के लिए होगा। कार्टोसैट-2 एफ की तसवीरों का उपयोग सड़क नेटवर्क की निगरानी, जल वितरण, भूमि उपयोग का मानचित्र बनाने, भौगोलिक एवं मानव निर्मित सुविधाओं और विभिन्न भूमि सूचना प्रणाली (एलआईएस) के साथ-साथ भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) को बदलने के लिए भी किया जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक मीटर से भी कम की अच्छी रीजोलुशन वाली तस्वीरों का सीमाओं निगरानी में अच्छी मदद मिलेगी।

इस प्रक्षेपण में कार्टोसैट-2 एफ के अलावा पीएसएलवी सी 40 अपने साथ 30 छोटे उपग्रह भी ले गया था,जिसमें भारत का एक सूक्ष्म और एक नैनो-उपग्रह तथा 6 देशों कनाडा, फिनलैंड, फ्रांस, कोरिया गणराज्य,ब्रिटेन और अमेरिका के तीन माइक्रो सैटेलाइट और 25 नैनो सैटेलाइट शामिल थे। गौरतलब है कि इन उपग्रहों को दो अलग-अलग कक्षाओं में तैनात किया गया। कार्टोसैट को 510 किलोमीटर की ऊंचाई पर सन सिंक्रोनस ओर्बिट में छोड़ा गया जबकि 30 सूक्ष्म और नैनो उपग्रहों को 349 किलोमीटर की ऊंचाई पर पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया। दो अलग-अलग कक्षाओं में उपग्रहों का स्थापित किया जाना मिशन को अनोखा बनाता है क्योंकि इसमें रॉकेट के इंजन को चौथे चरण में कई बार बंद और कई बार चालू करने की आवश्यकता होती है। सभी उपग्रहों को दो कक्षाओं में स्थापित करने की प्रक्रिया में 2 घंटे और 21 मिनट लगे।

पीएसएलवी के सफल प्रक्षेपण के अच्छे रिकॉर्ड से प्रेरित इसरो बीते कई वर्षों से पीएसएलवी के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को प्रक्षेपण सेवा देने की पेशकश कर रहा है। अब तक पीएसएलवी अपने 15 मिशनों में 20 देशों के उपग्रहों को सफलतापूर्वक कक्षा में प्रक्षेपित कर चुका है। हाल के प्रक्षेपण मिशन से भारतीय प्रक्षेपण क्षमता पर दुनिया भर का विश्वास और मजबूत हुआ है। अब यह भी स्पष्ट हो गया है कि सूक्ष्म और नैनो उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की भारत की क्षमता कई अन्य राष्ट्रों से आगे है, क्योंकि अमेरिका जैसे देश भी अपने नैनो-उपग्रहों को प्रक्षेपति करने के लिए भारत का रुख कर रहे हैं।

वर्ष 2018 में अपने पहले मिशन की सफलता के साथ, इसरो इस वर्ष के लिए तय किए गए अन्य महत्वपूर्ण अभियानों के लिए और तत्पर हो सकता है। इस वर्ष महत्वाकांक्षी चंद्रयान-द्वितीय को मार्च में भेजे जाने की संभावना है। इस मिशन में इसरो अपने सबसे बड़े सैटेलाइट लॉन्चर, जिओसिंक्रोनस सैटेलाइट लांच वेहिकल मार्क-III का उपयोग करेगा। पिछले मिशन के मुक़ाबले चंद्रयान -2 एक ओर्बिट मिशन नहीं होगा बल्कि इसमें सतह के अध्ययन के लिए चंद्रमा पर रोवर उतारा जाएगा।

आलेख:- बिमान बासू, वरिष्ठ विज्ञान टिप्पणीकार