13.02.2018

जम्मू-कश्मीर में शोपियां गोलीबारी मामले में मेजर आदित्य कुमार के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर उच्च्तम न्यायालय द्वारा रोक लगाने की खबर, श्रीनगर के कर्ण नगर इलाके में आतंकी हमले की कोशिश और सुंजवां हमले के संबंध में रक्षामंत्री का बयान आज के अखबारों की सुर्खियां हैं। अमर उजाला और पंजाब केसरी ने मेजर आदित्य के खिलाफ कार्रवाई पर उच्चतम न्यायालय द्वारा रोक लगाने की खबर को प्रमुखता दी है। अमर उजाला ने इसे सेना का मान कहते हुए लिखा है- शीर्ष अदालत ने गिरफ्तारी और पूछताछ पर लगाई रोक। पंजाब केसरी ने लिखा है- गलत इरादे से नहीं चलाई गई थी गोलियां, केन्द्र और जम्मू-कश्मीर सरकार को जारी किया गया नोटिस। जनसत्ता लिखता है- रक्षामंत्री ने कहा- सुंजवां हमले में पाकिस्तानी आतंकवादी। पत्र लिखता है- सैन्य शिविर के बाद अब सीआरपीएफ पर हमला, कर्ण नगर में हमले में जवान शहीद। दैनिक जागरण ने भी रक्षामंत्री का बयान सबसे ऊपर दिया है- हमले में पाकिस्तान का हाथ, चुकानी पड़ेगी कीमत। दैनिक ट्रिब्यून और राजस्थान पत्रिका ने सीआरपीएफ कैम्प पर हमले की खबर सचित्र दी है। दैनिक भास्कर ने राज्य विधानसभा में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का वक्तव्य दिया है- भले ही मुझे देशद्रोही कहें, पर पाकिस्तान के साथ बात करें। हिन्दुस्तान की सुर्खी है -दिल्ली के बाजारों के बाद अब रिहाइशी इलाकों में गाज गिरेगी, आवासीय कालोनियों में भी सीलिंग। नवभारत टाइम्स की टिप्पणी है- रिहाइशी इलाकों पर सीलिंग की तलवार। अखबारों ने उच्चतम न्यायालय के इस सवाल को भी अहमियत दी है कि अपराधी किसी दल का मुखिया कैसे हो सकता है। पंजाब केसरी ने भी न्यायालय के हवाले से लिखा है- जो खुद चुनाव नहीं लड़ सकता, वो पार्टी कैसे बना सकता है? इकॉनोमिक टाइम्स ने बताया है- दवा वाले स्टेंट का दाम एनपीपीए ने और घटाया। बिना दवा वाले स्टेंट का एमआरपी बढ़ाया गया, कार्डियक कैथेटर, गाइड वायर का दाम बिल में अलग से लिखना होगा। राजस्थान पत्रिका ने पुणे की स्काई डाइवर शीतल महाजन के नौवारी साड़ी में 13 हजार फीट ऊंचाई से छलांग लगाकर रिकॉर्ड बनाने की खबर दी है। अमर उजाला ने शिमला के जाखू में सोमवार को ताजा बर्फबारी के बाद का खूबसूरत चित्र देते हुए लिखा है- पहाड़ो ने ओढ़ी बर्फ की रजाई।

‘पश्चिम एशिया में हम’ शीर्षक से प्रकाशित अपने संपादकीय में ‘नवभारत टाइम्स’ लिखता है कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन पश्चिमी एशियाई देशों की यात्रा का मकसद व्यापारिक संबंधों को मजबूत बनाने के साथ ही कूटनीतिक रिश्तों में एक नया संतुलन बनाना भी था। विदेश नीति में संतुलन से ज्यादा जरूरी चीज शायद ही कोई और होती हो। हाल के वर्षों में भारत और इजरायल बेहद करीब आए हैं। प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा इस मामले में मील का पत्थर ही कही जा सकती है, लेकिन इलाके के सारे अरब देशों के लिए इजरायल की स्थिति एक शत्रु देश जैसी है। खासकर इजरायल सरकार से लंबे संघर्ष में उतरे फिलिस्तीनियों के लिए भारत का इजरायल-समर्थक रुख एक बड़े धक्के जैसा था। फिलिस्तीन के साथ भारत के रिश्ते पारंपरिक रूप से बहुत अच्छे रहे हैं। ऐसे में इजरायल से बढ़ती नजदीकी को ध्यान में रखते हुए फिलिस्तीन को आश्वस्त करना जरूरी था कि हमारी नजर में उसका महत्व भी पहले से कम नहीं हुआ है। ओमान पूर्वी अफ्रीका के उभरते बाजारों तक पहुंच बनाने में भारत के लिए मददगार साबित होगा, जो अभी चीन के लिए कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी का सबब बने हुए हैं। यमन का गृहयुद्ध लंबे समय से भारत के लिए चिंता का विषय है। उस इलाके में समुद्री सुरक्षा की दृष्टि से भी ओमान हमारे लिए बेहद उपयोगी है। इसी तरह फिलिस्तीन के साथ करीब 5 करोड़ डॉलर के छह समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। कुल मिलाकर यह एक सफल दौरा रहा और इसने पश्चिम एशिया में भारत को नई पहचान दी है।

‘दैनिक जागरण’ ने अपने संपादकीय ‘दुस्साहस की पराकाष्ठा’ में लिखा है कि ऐसी सूचनाओं से देश को शायद ही संतुष्टि मिले कि जम्मू-कश्मीर में लगातार हो रहे आतंकी हमलों को लेकर पाकिस्तान को सबक सिखाने पर गंभीर मंथन शुरू हो गया है। आखिर ऐसा कोई मंथन सुंजवां में सेना के ठिकाने पर हमले के पहले क्यों नहीं किया गया-और वह भी तब जब ऐसे हमलों के साथ संघर्ष विराम के उल्लंघन का सिलसिला एक अर्से से कायम है? यह पाकिस्तान और उसके पाले-पोसे आतंकियों के दुस्साहस की पराकाष्ठा ही है कि जम्मू के सुंजवां में सेना की कार्रवाई समाप्त होने के पहले ही श्रीनगर में सीआरपीएफ के शिविर को निशाना बनाने की कोशिश की गई। तीन दिन के अंदर सुरक्षा बलों के दो ठिकानों को निशाना बनाया जाना यही बताता है कि जैश और लश्कर सरीखे आतंकी संगठनों के जरिये पाकिस्तान ने अपने छद्म युद्ध को तेज कर दिया है। यह छद्म युद्ध वास्तविक युद्ध से इसलिए कहीं घातक है, क्योंकि इसका कोई नियम नहीं।  अब जब पानी सिर के ऊपर बहने लगा है तब पाकिस्तान को कठोर दंड का भागीदार बनाने के साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि सुरक्षा बलों के ठिकानों पर तमाम हमलों के बाद भी आतंकी पहले जैसे तौर-तरीकों से वहां घुसने में कैसे सफल हो जा रहे हैं? वे अगर सैन्य ठिकानों में घुसने के पहले ही मार गिराए जा रहे होते तो शायद ऐसे ठिकानों को निशाना बनाने का सिलसिला न जाने कब थम जाता।