16.05.2018

देश के विभिन्न समाचार पत्रों ने विविध विषयों पर संपादकीय लेख प्रकाशित किए हैं। साथ ही अन्य समाचारों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत न मिलने का सभी अखबारों ने अपने अपने हिसाब से आकलन किया है। हिन्दुस्तान ने लिखा है- कर्नाटक में सत्ता का पेंच फंसा। जनसत्ता के अनुसार- चुनाव खत्म राजनीति शुरू। दैनिक जागरण का कहना है- सरकार का फैसला राज्यपाल के हाथ। राष्ट्रीय सहारा ने इसे शीर्षक दिया है- नतीजों के बाद अब ‘कर-नाटक। पंजाब केसरी का कहना है- कमल का कमाल, बहुमत का मलाल। वाराणसी में एक निर्माणाधीन फ्लाईओवर के बीम गिरने की खबर सभी अखबारों में सचित्र है। दैनिक ट्रिब्यून ने इसे भीषण हादसा बताते हुए लिखा है- प्रधानमंत्री ने जताया दुख तो मुख्यमंत्री ने दिये जांच के आदेश। दिल्ली के मास्टर प्लान 2021 में संशोधन पर आपत्तियां मांगने के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा केन्द्र को 15 दिन का समय दिये जाने की खबर दैनिक जागरण सहित अधिकतर अखबारों में है। पत्र ने इसे शीर्षक दिया है- मास्टर प्लान में बदलाव पर कोर्ट सहमत। कार्मिक राज्य मंत्री जितेन्द्र सिंह का यह बयान कि पेंशन के लिए आधार जरूरी नहीं है, जनसत्ता में है। पत्र ने लिखा है- मंत्री की यह टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ सेवानिवृत्त कर्मचारियों को आधार नहीं होने के कारण अपने बैंक खातों में पेंशन प्राप्त करने में परेशानी हो रही है। दैनिक जागरण की खबर है- विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति में से एक आयुर्वेद का वैज्ञानिक आधार तैयार करने के लिए पाठ्यक्रम शुरू करने की तैयारी की जा रही है। पत्र ने लिखा है- आयुर्वेद बायोलोजी के नाम से शुरू हो रहे इस पाठ्यक्रम को जेएनयू ने सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। राजस्थान पत्रिका ने बुलंद हौसले की इस खबर को प्रमुखता से दिया है- रोक हटने के बाद 69 साल के बोयु पहले दिव्यांग पर्वतारोही बने। पत्र ने लिखा है- 40 साल पहले उन्होंने एवरेस्ट पर चढ़ते समय दोनों पांव गवां दिये थे लेकिन हिम्मत नहीं हारी और अब पांचवें प्रयास में उन्हें सफलता मिली।

‘कर्नाटक के आगे’ शीर्षक से प्रकाशित अपने संपादकीय में हिन्दुस्तान लिखता है कि, नतीजे आए और राजनीति शुरू हो गई। लेकिन फिलहाल दिलचस्प कर्नाटक विधानसभा के नतीजे हैं, जिनका संदेश कई तरह से एकदम स्पष्ट है, भले ही इन नतीजों में किसी को भी स्पष्ट बहुमत न मिला हो। भारतीय जनता पार्टी बहुमत के बहुत पास ही नहीं पहुंची, बल्कि नरेंद्र मोदी के तिलिस्म ने दक्षिण भारत में दस्तक दे दी है। कर्नाटक के इन चुनावों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि मोदी और अमित शाह की जोड़ी देश की सबसे जबर्दस्त चुनावी मशीन है। वह मतदाताओं के मनोविज्ञान, राजनीति के यथार्थ और जमीनी गणित, चुनाव जीतने के सभी कारकों को एक साथ साधना जानती है। यह जोड़ी जब पूर्वोत्तर भारत के पुराने कांग्रेसी और भाजपा के लिए लगभग असंभव माने जाने वाले किलों में सेंध लगा सकती है, तो इस लिहाज से कर्नाटक कोई बड़ी चीज नहीं है। भाजपा को यह जीत उस समय मिली है, जब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के चार साल पूरे हो रहे हैं। सरकार की चैथी वर्षगांठ पर मिला जीत का यह तोहफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि कई जगह कर्नाटक के इन विधानसभा चुनावों को 2019 के आम चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा था। इस लिहाज से देखें, तो नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ यह सेमीफाइनल जीत लिया है, बल्कि अपने प्रतिद्वंद्वी के हौसले को बुरी तरह पस्त भी कर दिया है। भले ही ये नतीजे सेमीफाइनल न हों लेकिन इससे भाजपा का रास्ता कुछ तो आसान हुआ ही होगा। चुनाव नतीजों के विस्तार में जाएं, तो पता लगता है कि भाजपा ने इस बढ़त को हासिल करने में कितनी मेहनत की थी। एक तरफ जहां भाजपा को मिली सीटें कांग्रेस को मिली सीटों से काफी ज्यादा दिख रही हैं, तो वहीं आंकडे़ यह भी बता रहे हैं कि भाजपा को कांग्रेस से कम वोट (प्रतिशत में) मिले हैं। चुनाव मैदान में इस तरह का कमाल उसी सूरत में संभव है, जब आपने एक-एक निर्वाचन क्षेत्र के जमीनी गणित का ध्यान रखते हुए रणनीति तैयार की हो। कांग्रेस चाहे तो इसे लेकर खुश भी हो सकती है कि वह बहुमत से भले ही बहुत दूर रह गई हो, लेकिन उसने अपने मत प्रतिशत में मामूली सा सुधार ही किया है। लगातार पांच साल तक सरकार चलाने के बाद मत प्रतिशत में मामूली सुधार कोई कम महत्वपूर्ण बात नहीं है। ठीक यहीं पर पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के जनता दल-सेकुलर का जिक्र भी जरूरी है। भाजपा और कांग्रेस के कड़े मुकाबले के बीच उन्होंने अपनी पार्टी को अप्रासंगिक नहीं होने दिया और तीसरी ताकत के रूप में मजबूती से खड़ा रखा। जनता दल-सेकुलर को मिली सीटें बता रही हैं कि चुनाव के बाद की राजनीति में उनकी पार्टी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के ये नतीजे इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण हैं कि इसने किसी भी दल को पूरी तरह संतुष्ट भले ही न किया हो, लेकिन सभी को खुश रहने का कुछ न कुछ कारण जरूर दिया है। इसके बाद अब अगला चुनावी मोर्चा राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में खुलेगा। इन तीनों राज्यों में भाजपा और कांग्रेस एकदम आमने-सामने होंगी और कोई तीसरा दल नहीं होगा। इस साल के अंत में होने वाले ये विधानसभा चुनाव उस समय होंगे जब अगला आम चुनाव भी सिर पर होगा। जाहिर है कि अगला एक साल भाजपा के अश्वमेध यज्ञ का है, तो कांग्रेस के लिए यह करो या मरो का समय होगा। पिछले कुछ समय र्से इंधन के मूल्य निर्धारण की जो स्थिति बनी हुई है, उसमें इस बढ़ोतरी के टाले जाने का कारण कर्नाटक विधानसभा चुनाव को बताया जा रहा था। शायद वह आकलन सही भी था, क्योंकि कर्नाटक में मतदान खत्म होने के बाद ही पेट्रोल की कीमत में सत्रह पैसे और डीजल के दाम में इक्कीस पैसे की वृद्धि कर दी गई। हालांकि महज उन्नीस दिन पहले जब पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि की गई थी, तब भी यह साफ था कि इसका असर बाजार पर पड़ेगा। चूंकि बाजार में मौजूद लगभग सभी वस्तुओं की ढुलाई परिवहन पर निर्भर होती है, इसलिए डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर बहुत सारी चीजों की मूल्य वृद्धि के रूप में सामने आता है। जब भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी होती है तो उसका सीधा असर वस्तुओं के दाम पर पड़ता है। इसलिए अगर थोक मूल्य आधारित मुद्रास्फीति की दर अप्रैल में पिछले चार महीने में उच्चतम स्तर पर बढ़ कर 3.18 फीसद हो गई और खुदरा मुद्रास्फीति की दर 4.58 फीसद पर पहुंच गई तो महंगाई बढ़ना स्वाभाविक ही है। लेकिन महंगाई की समस्या के और गहराने की आशंका इसलिए भी है कि सोमवार को तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल के दामों में एक बार फिर से बढ़ोतरी कर दी। पिछले कुछ समय र्से इंधन के मूल्य निर्धारण की जो स्थिति बनी हुई है, उसमें इस बढ़ोतरी के टाले जाने का कारण कर्नाटक विधानसभा चुनाव को बताया जा रहा था। गौरतलब है कि मार्च में थोक महंगाई दर जब 2.47 फीसद दर्ज की गई थी, तब एक तरह से राहत महसूस हुई थी। मुद्रास्फीति में पिछले साल दिसंबर से ही गिरावट बनी हुई थी। लेकिन अंतर राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई और भारत में पेट्रोलियम के दाम चढ़े। फलों और सब्जियों सहित खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़ने से थोक मुद्रास्फीति में भी तेजी आई और अब यह आंकड़ा 3.18 फीसद पर पहुंच गया। यों मुद्रास्फीति की दर को नियंत्रित रखने के लिए रिजर्व बैंक नीतिगत दरों में वृद्धि का सहारा लेता रहा है। लेकिन पिछले कुछ सालों से मुद्रास्फीति की उच्च दर को नियंत्रित करने में मौद्रिक नीति की भूमिका कम हो रही है। निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था की चमकती तस्वीर और विकास दर के ग्राफ के हवाले के बरक्स लोगों के जीवन स्तर को उनकी रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें ज्यादा प्रभावित करती हैं। इसके बेलगाम होने से सामान्य जरूरतों की खरीद-फरोख्त का संतुलन भी प्रभावित होता है। जब जीएसटी लागू किया गया था, तब दावा किया गया था कि देश भर में जरूरत के सामान की कीमतों में एकरूपता आएगी और उनमें कमी आएगी। लेकिन यह दावा सही साबित नहीं हुआ। पिछले कुछ समय से लगातार बाजार में खासतौर पर खाने-पीने की वस्तुओं के दाम में काफी बढ़ोतरी दर्ज की गई। सवाल है कि सत्ता में आने के पहले भाजपा ने महंगाई कम करने के जो वादे किए थे, उन्हें पूरा करने की जरूरत क्यों महसूस नहीं की गई! आजकल जिस तरह के सवाल राजनीति में हावी रहते हैं, उनमें महंगाई कोई मुद्दा नहीं बन पाती। लेकिन अगर कभी इस पर चिंता बढ़ने लगती है तो सरकार महंगाई कम होने का दावा करती है। पिछले साल जब सरकार महंगाई की दर नीचे गिरने के दावे कर रही थी, उस समय भी खुदरा बाजार में उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें काफी ऊंची थीं। जिस दौर में कई वजहों से रोजगार का क्षेत्र काफी सिकुड़ता गया है, लोगों के सामने रोजी-रोटी का सवाल एक बड़ी चिंता बन कर उभरा है, उसमें जरूरी वस्तुओं की बढ़ती कीमतें दोहरी मार की तरह हैं।