कोरियाई प्रायद्वीप में नए युग की शुरुआत।

आलेख – स्कन्द राजन तायल, दक्षिण कोरिया में पूर्व भारतीय राजदूत।  

अनुवाद और वाचन – डॉ. श्रुतिकान्त पाण्डेय

मंगलवार को सिंगापुर में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन के बीच हुई ऐतिहासिक शिखरवार्ता से कोरियाई प्रायद्वीप में नए युग की शुरुआत हुई है। 1950 से 53 तक चले भीषण कोरिया युद्ध के बाद जुलाई 1953 में संघर्षरत पक्षों के बीच युद्धविराम सन्धि पर सहमति हुई। इस समझौते पर तीन पक्षों; संयुक्तराष्ट्र कमान, चीनी स्वयंसेवक सेना और उत्तर कोरियाई सेना के नुमाइंदों ने दस्तखत किए।

पिछले 12 महीनों से उत्तर और दक्षिण कोरिया के लोग भयंकर उहापोह के हालातों से गुज़र रहे थे। कभी उनके सिर पर अमरीका की तरफ से युद्ध का खतरा मँडरा रहा था, तो कभी शान्ति वार्ता की संभावना मज़बूत होती दिख रही थी। इन हालातों में दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जे ने सुलह की अथक कोशिशें कीं। इन कोशिशों के जवाब में उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग ने भी आश्चर्यजनक तौर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। इन प्रयासों के चलते इस साल की शुरुआत से ही कोरियाई प्रायद्वीप में सुलह की आहट सुनाई देने लगी थी।  

इस दिशा में पहली सफलता 27 अप्रैल को राष्ट्रपति मून जे और उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग के बीच शिखर बातचीत के तौर पर सामने आई। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच हुई सकारात्मक वार्ता के बाद ऐतिहासिक पनमुंजम घोषणापत्र पर दस्तखत किए गए। इस दस्तावेज़ को ‘कोरियाई प्रायद्वीप में शान्ति, समृद्धि और एकीकरण घोषणा’ का नाम दिया गया। यही वह मील का पत्थर है, जिससे आगे किम जोंग और डोनाल्ड ट्रम्प के बीच शिखर बातचीत की भूमिका तैयार हुई।

मंगलवार की शिखरवार्ता से पहले अमरीकी और उत्तर कोरियाई प्रतिनिधिमण्डलों के बीच विस्तृत और गहन विचार-विमर्श हुआ। इस प्रक्रिया के दरम्यान पिछले महीने एक मौके पर ऐसा लगा कि शान्ति प्रक्रिया असफलता की तरफ जा रही है। यहाँ तक कि अमरीकी राष्ट्रपति ने बातचीत से पीछे हटने के संकेत भी दे दिए थे। लेकिन, दोनों तरफ के रणनीतिकारों ने हार नहीं मानी और आहिस्ते-आहिस्ते बात बनने लगी। इसे देखते हुए दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ने एक बार फिर किम जोंग उन से बात की। उन्होंने राष्ट्रपति ट्रम्प से भी वार्ता की प्रक्रिया जारी रखने का आग्रह किया।

इन सब प्रयासों का सुफल है कि 12 जून की शिखरवार्ता पूरी तरह उम्मीदों पर खरी उतरी है। इस दौरान अमरीका ने उत्तर कोरिया को बराबरी का दर्जा दिया, जो प्योंगयोंग के लिए गर्व की बात है। राष्ट्रपति ट्रम्प और किम जोंग ने एक दूसरे की तरफ सकारात्मक नज़रिया दर्शाया, जिससे बातचीत का माहौल उत्साहजनक बनाने में मदद मिली।

बातचीत के बाद, संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर के दौरान डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि किम जोंग से मिलना उनके लिए सम्मान की बात है और उन दोनों के बीच विशेष अपनापन मौजूद है। पिछले साल दोनों नेताओं के बयानों की पृष्ठभूमि में उनके हालिया वक्तव्यों को वाकई आश्चर्यजनक कहा जा सकता है।

शिखर बातचीत के बाद दोनों नेताओं ने एक समग्र समझौते पर दस्तखत किए, जिसके तहत ‘यू.एस.-डी.पी.आर.के.’ की मार्फत पूरे कोरियाई प्रायद्वीप में सकारात्मक बदलाव सुनिश्चित किए जाएगा। समझौते के मुताबिक उत्तर कोरिया में शान्ति और समृद्धि के लिए परमाणु निरस्तीकरण की प्रक्रिया जल्दी ही शुरु की जाएगी। हालांकि समझौते में किसी विस्तृत योजना का ज़िक्र नहीं है, लेकिन इतना ज़रूर कहा गया है कि सबकुछ समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाएगा। कोरियाई प्रायद्वीप में स्थायी शान्ति के लिए उत्तर कोरिया को पूरी सुरक्षा का वायदा किया गया है। डी.पी.आर.के. में उत्तर कोरियाई परमाणु कार्यक्रम को युद्ध के बदले शान्ति का माध्यम बनाने की बात कही गई है। फिलहाल, इस समझौते में प्योंगयोंग से प्रतिबन्ध वापसी पर कुछ नहीं कहा गया है; लेकिन डोनाल्ड ट्रम्प के मुताबिक डी.पी.आर.के. की शर्तों पर अमरीका के सन्तुष्ट होने के बाद प्रतिबन्ध वापसी की शुरुआत की जाएगी।

12 जून को हस्ताक्षरित ‘यू.एस.-डी.पी.आर.के.’ का स्वरूप काफी हद तक अक्तूबर 1994 में अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और उत्तर कोरिया के बीच हस्ताक्षरित सन्धि जैसा ही है। हालांकि वह सन्धि परस्पर विश्वास की कमी के चलते सफल नहीं हो पाई थी। इस बार दोनों नेताओं डोनाल्ड ट्रम्प और किम जांग उन ने काफी समझदारी और निर्णयक्षमता का परिचय दिया है। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देशों के बीच हुइ सहमति न केवल कोरियाई प्रायद्वीप बल्कि पूरी दुनिया के लिए शान्ति का सबब साबित होगी।

भारत ने इस शिखर बातचीत का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि इसके परिणाम सभी के लिए सकारात्मक होंगे। उसे आशा है कि ‘यू.एस.-डी.पी.आर.के.’ का समग्र परिपालन सुनिश्चित किया जाएगा ताकि कोरियाई प्रायद्वीप में स्थायी शान्ति और स्थिरता लौटाई जा सके। पाकिस्तान और उत्तर कोरिया के बीच परमाणु तकनीक के अवैध व्यापार की तरफ इशारा करते हुए नई दिल्ली ने उम्मीद ज़ाहिर की है कि कोरियाई प्रायद्वीप में परमाणु निरस्तीकरण से भारत के पड़ौस से जारी परमाणु तकनीक के अवैध व्यापार पर भी रोक लगेगी।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हालिया समझौते से कोरियाई प्रायद्वीप पर लम्बे वक्त से मँडरा रहा युद्ध का खतरा टल गया है। लेकिन उत्तर कोरिया के लिए राह अभी आसान नहीं है। परमाणु निरस्तीकरण पर अमरीका की तसल्ली के बाद ही वह प्रतिबन्धमुक्त हवा में साँस ले सकेगा।