11.10.2018

देश के विभिन्न समाचार पत्रों ने विविध विषयों पर सम्पादकीय लेख लिखे हैं। इसके अतिरिक्त अन्य समाचारों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है। उच्चतम न्यायालय द्वारा विभिन्न मामलों में आदेश दिए जाने को आज अधिकतर अखबारों ने प्रमुखता दी है। बकौल जनसत्ता- रियल एस्टेट आम्रपाली समूह की नोएडा, ग्रेटर नोएडा और बिहार में नौ संपत्तियां सील करने का आदेश। नवभारत टाइम्स लिखता है- ग्रेटर नोएडा ऑथरिटी पर कर्ज 5 हजार आठ सौ करोड़, इसमें आम्रपाली पर ही बकाया अथॉरिटी का तीन हजार करोड़ बकाया। हिंदुस्तान की सुर्खी है उत्तर प्रदेश सरकार ने रियल स्टेट-2018 से जुड़ी नियमावली को मंजूरी दी। बिल्डर बुकिंग राशि 10 फीसदी से अधिक नहीं ले सकेंगे। राष्ट्रीय सहारा ने राफाल मामले पर उच्चतम न्यायालय के हवाले से लिखा है- बताओ कैसे-कैसे खरीदा राफाल। सरकार से सीलबंद लिफाफे में मांगा जवाब। दैनिक जागरण की बड़ी खबर है, दहलने से बचा पंजाब, हॉस्टल से तीन आतंकी गिरफ्तार। राष्ट्रीय सहारा की खबर है- कॉलेजों में मूल दस्तावेजों की फोटोकॉपी से ही मिल जाएगा एडमिशन, दाखिला छोड़ने पर संस्थान को वापस करनी होगी पूरी फीस। देश में घूस लेने वाले ही नहीं देने वाले भी बढ़ रहे हैं- हिंदुस्तान ने ट्रांसपरेसी इंटरनेशनल इंडिया की रिपोर्ट के हवाले से लिखा है। इस साल 11 फीसदी ज्यादा लोगों ने रिश्वत दी। देश में पहली बार हुआ खोपड़ी का सफल प्रतिरोपण, राजस्थान पत्रिका के अनुसार पुणे के डॉक्टरों का कमाल, चार वर्षीय बच्ची को थ्री-डी खोपड़ी लगाई।

‘राष्ट्रीय सहारा’ ने ‘उचित मांग’ शीर्षक से प्रकाशित अपने संपादकीय में लिखा है कि, संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने इस महत्त्वपूर्ण नियंतण्र संगठन के ढांचे और कार्यपण्राली में सुधार करने का सुझाव दिया है, जो मौजूदा दौर की अहम जरूरत है। हालांकि लंबे समय से भारत सहित अनेक सदस्य देशों ने स्वीकार किया है कि यह संगठन मौजूदा दौर की परिस्थितियों के अनुकूल नहीं है, बावजूद इसके महाशक्तियों के बीच अनवरत रूप से जारी सत्ता की राजनीति के कारण इसके संरचनात्मक और प्रक्रियागत ढांचे में सुधार की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई है। उन्नीस सौ पैंतालिस में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी। तब पचास देश इसके सदस्य थे, और आज करीब एक सौ नब्बे से ज्यादा देश। आज विश्व की भू-राजनीति बदल रही है। आतंकवाद, साइबर क्राइम जैसे नये किस्म के अपराधों के साथ-साथ नियंतण्र स्तर पर सशस्त्र संघर्ष तेज हुआ है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से गठित इस संस्था की संरचना और कार्यपण्राली में समय की मांग के अनुरूप सुधार नहीं हो पाया है। ऐसा ही चलता रहा तो इस संगठन का भी वही हश्र होगा जो प्रथम विश्व युद्ध के बाद गठित राष्ट्र संघ का हुआ था। नई दिल्ली लंबे समय से सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की मांग कर रही है, लेकिन अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, रूस और चीन जैसे पांच स्थायी सदस्यों की सत्ता राजनीति के चलते बात नहीं बन पा रही। इन पांचों देशों की जिम्मेदारी बनती है कि इस संगठन को चुनौतियों से निपटने लायक बनाने के लिए भारत समेत जर्मनी, जापान जैसे देशों को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने के लिए आगे बढ़कर पहल करें।

‘तापमान घटाने की चेतावनी नहीं सुनी तो तबाही तय’ शीर्षक से प्रकाशित अपने संपादकीय में ‘दैनिक भास्कर’ लिखता है कि, संयुक्त राष्ट्र की इंटरगवर्नमेंटल पैनल आॅन क्लाइमें चेंज (आईपीसीसी) ने धरती को गर्मी से बचाने के लिए उसकी तापमान वृद्धि को 2 डिग्री के बजाय 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की अंतिम चेतावनी दे दी है। अगर दुनिया इस चेतावनी को नहीं सुनती है और 2100 तक 2 डिग्री के लक्ष्य को मानकर चलती है तो उसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। हालांकि, इस बात की संभावना कम ही है कि इस साल दिसंबर के महीने में पोलैंड में होने जा रहे जलवायु सम्मेलन में कोई ठोस उपाय निकलेगा। आईपीसीसी ने कह दिया है कि पिछले 150 वर्षों में धरती के तापमान में होने वाली वृद्धि अगले 12 वर्षों में ही 1.5 डिग्री तक पहुंचने वाली है। हो सकता है उसमें थोड़ा और समय लगे तो वह समय भी 2050 तक ही होगा। रिपोर्ट के अनुसार, अगर हम तापमान बढ़ना नहीं रोक सके तो धरती पर सूखा पड़ेगा, बाढ़ आएगी, गर्म हवाओं के जानलेवा झोंके चलेंगे और हमारे ग्लेशियर पिघल जाएंगे। समुद्र का पानी और खारा हो जाएगा और देश के रूप में मौजूद कई द्वीप डूब जाएंगे। अगर हम तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि पर रोक लें तो आठ प्रतिशत पादप व 4 प्रतिशत प्राणी प्रजातियां बचा सकेंगे। इसी तरह समुद्र में पकड़ी जाने वाली 15 लाख टन मछलियों का फायदा होगा और मक्के की फसल का भी चार प्रतिशत हिस्सा बचाया जा सकेगा।