09.11.2018

देश के विभिन्न समाचार पत्रों ने विविध विषयों पर संपादकीय लिखे हैं और साथ ही कुछ सुर्खियां भी ध्यान आकर्षित करती हैं। आज देश भर से प्रकाशित हिंदी समाचार पत्रों ने अलग अलग विषयों पर सम्पादकीय लिखे हैं। इसके अतिरिक्त अन्य समाचारों ने भी मुखपृष्ठ पर स्थान पाया है।

दिल्‍ली का वायु प्रदूषण अखबारों की बड़ी खबर है। हिन्‍दुस्‍तान की सुर्खी है दिल्‍ली का दम फूला। न पटाखे रूके, न प्रदूषण। एनसीआर में वायु गुणवत्‍ता और खराब 520 लोगों पर कार्रवाई।

नोटबंदी की दूसरी बरसी पर सत्‍तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्‍यारोप अखबरों के मुख पृष्‍ठ पर है। जनसत्‍ता लिखता है- वित्‍त मंत्री अरूण जेटली बोले- नोटबंदी से औपचारिक अर्थव्‍यवस्‍था का विस्‍तार हुआ। कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना है- गहरे हो रहे जख्‍म। खाड़ी देशों में नौकरी के लिए जाने वाले भारतीय नागरिकों की मौत के पिछले साढ़े छह वर्ष के आंकड़ों के विश्‍लेषण के हवाले से नवभारत टाइम्‍स लिखता है- खाड़ी देशों से आने वाले हर एक अरब डॉलर की एवेज में औसतन 117भारतीयों की जान जाती है। इनमें से ज्‍यादातर मौतें स्‍वाभाविक नहीं होती। जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के एक प्रोफेसर और छात्र के प्रयासों पर दैनिक जागरण की सुर्खी है- आर्टिफिशयल इं‍टेलिजेंस से मिलेगी दृष्टिहीनों को रोशनी। जो देख नहीं सकते उनके लिए एक चिप के रूप में उभरी नई उम्‍मीद। आंखो के आई बॉल के अंदर इसे किया जायेगा फिट। जिंदगी भर साथ निभा सकता है चिप के साथ लगा एंटिना।

 

‘प्रतिभाओं की नई मंजिल’ नाम से अपने सम्पादकीय शीर्षक में हिन्दुस्तान कहता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का असर अब दूर तक दिखने लगा है। उनकी एच1बी वीजा नीति से खड़ी हुई समस्याओं ने भारत की इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में दस्तक दे दी है। दुनिया भर की बड़ी-बड़ी कंपनियां इस समय आईआईटी में जाकर प्रतिभाशाली छात्रों की भर्ती करती हैं। अमेरिकी कंपनियां यहां आ रही हैं, पर पहले के मुकाबले कम भर्ती कर रही हैं। लेकिन इस साल समस्या कुछ ज्यादा गंभीर होती नजर आ रही है। एच1बी वीजा नीति के चलते ज्यादातर अमेरिकी कंपनियां यह स्पष्ट करने से कतरा रही हैं कि भर्ती होने वाले युवाओं की तैनाती कहां होगी? आईआईटी, बंबई से आई खबरों के अनुसार अमेरिकी कंपनियों में सिर्फ माइक्रोसॉफ्ट ही ऐसी है, जिसने स्पष्ट किया है कि भर्ती किए गए लोगों की तैनाती उसके मुख्यालय रेडमंड में होगी।

जिस समय आईआईटी के कैंपस सिलेक्शन में अमेरिकी कंपनियों की भूमिका कम हो रही है, चीन की कंपनियों की भूमिका बढ़ रही है। पर भारतीय आईआईटी से सबसे बड़े पैमाने पर भर्तियां जापान की कंपनियां ही कर रही हैं। वैसे हर बार की तरह इस बार यूरोप, कनाडा और सिंगापुर आदि की कंपनियां भी सलेक्शन में उतरी हैं, पर अमेरिका या जापान की तुलना में उनकी भूमिका बहुत ज्यादा नहीं है।

फिलहाल खबर यही है कि दुनिया भर की प्रतिभाओं को आकर्षित करने में सबसे आगे माना जाने वाला देश अमेरिका अब लगातार पिछड़ रहा है। और इसका कारण खुद वहां की नीतियां हैं।

नवभारत टाइम्स अपने सम्पादकीय शीर्षक ‘खाड़ी में देसी मौतें’ के अंतर्गत लिखता है कि खाड़ी देशों में कमाने गए हिंदुस्तानी वहां से अपनी गाढ़ी कमाई का जो हिस्सा घर भेजते हैं, उसकी चर्चा हमेशा होती है लेकिन इसकी जो कीमत उन्हें चुकानी पड़ती है, उस पर अमूमन किसी का ध्यान नहीं जाता। हाल ही में आरटीआई के तहत हासिल की गई सूचनाओं के विश्लेषण से जो चित्र सामने आ रहा है, वह दिल दहलाने वाला है। उधर से आने वाले हर एक अरब डॉलर की एवज में औसतन 117 भारतीयों की जान जाती है। कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव (सीएचआई) ने विशेष प्रयत्नों के जरिये बहरीन, ओमान, कतर, कुवैत, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में पिछले साढ़े छह वर्षों में हुई भारतीयों की मौतों और उनके द्वारा भेजी गई रकम के आंकड़े जुटाए और दोनों को साथ रखकर उनका अध्ययन किया। इन छह देशों की अहमियत इस मायने में है कि यहां से सबसे ज्यादा रकम भारत भेजी जाती है। दुनिया भर में फैले भारतीय मूल के लोगों की संख्या तीन करोड़ से भी ज्यादा है, जिनमें से करीब 90 लाख खाड़ी के देशों में रहते हैं। जहां तक बाहर से भेजी जाने वाली रकम का सवाल है तो सन 2012 से 2017 के बीच पूरी दुनिया से आई राशि का आधे से भी ज्यादा हिस्सा इन्हीं छह देशों से आया है। मगर इसी अवधि में इन छह देशों में 24,570 भारतीय कामगारों की मौत भी हुई। यानी इन देशों में हर दिन औसतन 10 भारतीय दुर्घटनाओं में या औचक बीमारियों से मरते रहे। इनमें से ज्यादातर मौतें स्वाभाविक नहीं हैं।

रोजी-रोटी की तलाश में खाड़ी देशों का रुख करने वाले भारतीय कामगारों को वहां बेहद कठिन और अपमानजनक स्थितियों में काम करना पड़ता है। आज के दौर में जब हम पूरी दुनिया में भारत का डंका बजने और भारतीयों की इज्जत बढ़ जाने की बात करते हैं तब अपनी मेहनत से दो देशों के विकास को गति देने वाले भारतीय इस तरह बेमौत मारे जाएं, यह बात किसी भी स्थिति में गले उतरने लायक नहीं है। सच है कि खाड़ी देशों का रुख करने वाले ज्यादातर भारतीय मेहनत-मजदूरी करने वाले लोग होते हैं। काम-काज का वैसा माहौल उन्हें नहीं मिल सकता, जैसा डॉक्टर-इंजीनियर या स्किल्ड लेबर को मिलता है। लेकिन अंतत: वे भारत के नागरिक हैं और हमारे लिए उनका जीवन भी मूल्यवान है। यह बात पूरी दुनिया को समझाने की पहली जिम्मेदारी हमारी सरकार की है। उसे सुनिश्चित करना होगा कि खाड़ी देशों में रह रहे इन भारतीयों का गरिमापूर्ण जीवन बिताने का संवैधानिक अधिकार बेमानी होकर न रह जाए।