श्रीलंका के समक्ष लोकतंत्र की परीक्षा

अगले कुछ दिनों तक सबकी निगाहें श्रीलंकाई संसद के 14 नवंबर के सत्र के दौरान होने वाले मतदान के परिणाम पर रहेंगी जिसके द्वारा निर्धारित किया जाएगा कि दो प्रत्यशियों में से इस द्वीपीय देश का प्रधानमंत्री कौन बनेगा। आशा है कि इसके साथ ही 26 अक्तूबर से चला आ रहा संवैधानिक संकट भी समाप्त हो जाएगा जो कि राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना द्वारा पदासीन प्रधानमंत्री श्री रानिल विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को नया प्रधानमंत्री बना देने से उत्पन्न हो गया था।

इसके बाद मुक़ाबला बराबरी का दिखाई दे रहा है। प्रधानमंत्री पद के दावेदार दोनों उम्मीदवारों के बीच मत का विभाजन समान प्रतीत हो रहा है। श्री विक्रमसिंघे के पास 225 सदस्यों वाली संसद में 102 सदस्यों का समर्थन है जबकि श्री राजपक्षे को 101 सदस्य समर्थन दे रहे हैं। इससे एक नाज़ुक स्थिति उत्पन्न होती प्रतीत हो रही है और कुछ सदस्य भी संतुलन बिगाड़ सकते हैं। श्री राजपक्षे की ओर टूटकर आने वाले पाँच में से चार सांसदों को पहले ही मंत्री पद दिया जा चुका है। ख़बर यह भी है कि नक़द धन भी दिया गया है। श्री राजपक्षे को इस बात की भी आशा है कि सत्तापक्ष से नाराज़ सांसद भी उनकी ओर आ सकते हैं। यद्यपि श्री विक्रमसिंघे ने घोषणा कर दी है कि उनके समर्थक दृढ़ता से उनके साथ हैं और कोई भी सांसद दूसरे पक्ष की ओर नहीं जाएगा।

शेष 22 सांसदों में से 6 सदस्यों वाली जनता विमुक्ति पेरमुना अर्थात जे वी पी और सिंहला राष्ट्रवादी दल ने पहले ही घोषणा कर दी है कि वे किसी भी उम्मीदवार का समर्थन नहीं करेंगे क्योंकि दोनों ही चुने जाने योग्य नहीं है। इसके बाद तमिल नेशनल अलायन्स(टी एन ए) जिसके पास 16 सांसद हैं पहले की तरह ही निर्णायक सिद्ध हो सकता है।

लेकिन बात इतनी सरल भी नहीं है। तमिल नेशनल अलायन्स जो 2015 से सिरीसेना-विक्रमसिंघे गठबंधन का हिस्सा रहा है अब एकमत नहीं बचा है।उत्तरी प्रांत के मुख्यमंत्री श्री सी वी विघ्नेश्वरन ने हाल ही में ही इस गठबंधन से अलग होकर अपना स्वयं का एक दल बना लिया है। 14 नवंबर को विश्वासमत के दौरान तमिल अलायन्स के ये दोनों टुकड़े एक ओर रहते हैं अथवा नहीं, यह देखने वाली बात होगी।

यही नहीं, वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह विश्वासमत राष्ट्रपति और स्पीकर की शक्ति का भी परीक्षण होगा। श्रीलंका की संसद में स्पीकर श्री कारु जयसूर्या ने श्री राजपक्षे को प्रधानमंत्री की मान्यता देने से मना कर दिया है जबकि उन्हें स्वयं राष्ट्रपति ने शपथ दिलाई थी। बुधवार को जब सदन की बैठक होगी तब स्पीकर प्रधानमंत्री राजपक्षे के साथ कैसा व्यवहार करते हैं वह देखने की बात होगी।

विश्व समुदाय द्वारा श्रीलंका के इस पूरे घटनाक्रम पर नज़र जमाए रखने का एक कारण यह है कि श्री राजपक्षे को चीन का हितैषी माना जाता है। उनके राष्ट्रपति कार्यकाल में चीन ने तेज़ी से श्रीलंका में अपने क़दम बढ़ाए थे। इसीलिए, श्रीलंका आज गहरे चीनी निवेश के क़र्ज़ में डूबा हुआ है। क़र्ज़ न चुका पाने की स्थिति में ही श्रीलंका सरकार द्वारा हम्बनटोटा बन्दरगाह चीन को लीज़ पर देने के लिए मजबूर होना पड़ा था। तो इस बात का आश्चर्य नहीं होगा कि श्री राजपक्षे की ताजपोशी के तुरंत बाद चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग उनका स्वागत करने आएं।

इतनी बड़ी संख्या में प्रेक्षकों के चलते यह विडंबना ही है कि श्रीलंका इस समय अपने ही बुने जाल में फंसकर बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा है। यह देश दक्षिण एशिया में लंबे समय से लोकतांत्रिक तरीके से चलने वाले इतिहास वाला रहा है। हाल के घटनाक्रम से सीख ली जाए तो पड़ोसी देश मालदीव ने सिद्ध कर दिया है कि ऐसे संवैधानिक संकट से बाहर निकलने में प्रतिनिधि संस्थाओं में बैठे लोगों की सकारात्मक इच्छाशक्ति ही कारगर होती है। श्रीलंका की संसद में 14 नवंबर को होने वाले विश्वासमत को भी इसी इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। भारत भी पूरे घटनाक्रम पर निगरानी कर रहा है। निकटतम पड़ोसी देश होने के कारण श्रीलंका में होने वाला कोई भी परिवर्तन दोनों देशों के संबंधों पर अपना प्रभाव अवश्य छोड़ेगा।

आलेख – एम के टिक्कू, राजनीतिक टिप्पणीकार