06.12.2018

देश के विभिन्न समाचार पत्रों ने विविध विषयों पर संपादकीय लिखे हैं और साथ ही कुछ सुर्खियां भी ध्यान आकर्षित करती हैं। अगुस्ता वेस्टलैंड हैलीकॉप्टर सौदे में बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल की पांच दिन की सीबीआई हिरासत अखबारों की बड़ी खबर है। जनसत्ता की सुर्खी है- ब्रिटिश उच्चायोग ने राजनयिक पहुंच देने की मांग की। उधर, मिशेल के वकील अल्जो के जोसेफ को युवा कांग्रेस से निकाले जाने की खबर भी पत्र ने प्रकाशित की है। मिशेल की हिरासत पर चुनावी रैली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान को हिन्दुस्तान ने सुर्खी दी है- राज खोलेगा राजदार मिशेल। दैनिक जागरण की बड़ी खबर है मिशेल के प्रत्यर्पण से डरा माल्या, मूल कर्ज देने को तैयार। भारत लाए जाने के आसार को देखते हुए बैंक और सरकार से की अपील। ब्रिटेन की अदालत का आने वाला है फैसला। आम्रपाली ग्रुप की संपत्ति जब्त करने के उच्चतम न्यायालय के आदेश पर राष्ट्रीय सहारा की सुर्खी है- प्रोपर्टी बेचकर पूरे होंगे प्रोजेक्ट। सुप्रीम कोर्ट ने दिया सख्त आदेश। ऋण वसूली न्यायाधिकरण से आम्रपाली के होटल, मॉल, इस्पात फैक्ट्री और कारपोरेट ऑफिस कब्जे में लेकर बेचने की प्रक्रिया शुरू करने को कहा। दैनिक भास्कर की अहम सुर्खी है- होम और ऑटो लोन पर मनमर्जी से बैंक ब्याज नहीं बढ़ा सकेंगे। अप्रैल से रेपो रेट घटने पर कर्ज भी तत्काल सस्ता करना होगा। कर्ज की व्यवस्था बदलेगी, फ्लोटिंग रेट वाले लोन पर ब्याज तय करने का एक ही मानक होगा। भारतीय रिजर्व बैंक इस महीने के आखिर तक जारी करने वाला है नए दिशा-निर्देश। नवभारत टाइम्स की सुर्खी है- अब खतरे में नहीं होगी गवाहों की जिंदगी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की योजना के मसौदे को दी मंजूरी। गवाहों को तय समय के लिए सुरक्षा और समय-समय पर उसकी की जाएगी समीक्षा। कुछ राज्यों में चुनावी सरगर्मी के बीच बचो फेक न्यूज शीर्षक से राजस्थान पत्रिका की टिप्पणी है- मैदान में या तो सोशल मीडिया है या फिर पेड न्यूज की बाढ़ है। चुनाव की गंभीरता का स्थान मनोरंजन ने ले लिया है।

‘अगस्ता में बड़ी कामयाबी’ नामक अपने शीर्षक में राष्ट्रीय सहारा लिखता है कि इतालवी कंपनी फिनमैकेनिका की ब्रिटिश सहयोगी कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड मामले के बिचौलिये क्रिश्चयन मिशेल को प्रत्यर्पण के बाद भारत लाया जाना मोदी सरकार की बड़ी कूटनीतिक सफलता है। संप्रग सरकार के कार्यकाल में हुए इस घोटाले में मिशेल मुख्य बिचौलिया था और इसके प्रत्यर्पण से भाजपा उत्साहित है। जाहिर है आगामी 11 दिसम्बर से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में यह मुद्दा जोर-शोर से उठेगा।  करीब 3700 करोड़ रुपये के अगस्ता वेस्टलैंड की वीवीआईपी हेलीकॉप्टर सौदे में कांग्रेस के नेताओं, नौकरशाहों और रक्षा मंत्रालयों के अधिकारियों पर रिश्वत लेने के आरोप लगते रहे हैं। इसीलिए भाजपा मानकर चल रही है कि मिशेल के प्रत्यर्पण से गांधी परिवार की मुसीबतें बढ़ सकती हैं। ईडी ने जून 2016 में मिशेल के खिलाफआरोप पत्र दाखिल किया था। इंटरपोल ने रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया था। इसके बाद फरवरी 2017 में उसे दुबई में गिरफ्तार किया गया। उसी के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने मिशेल के प्रत्यर्पण की जमीन तैयार की थी। क्रिश्चयन मिशेल ब्रिटिश नागरिक है, बावजूद उसका प्रत्यर्पण दर्शाता है कि भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच रणनीतिक सहयोग और साझेदारी बेहतर स्तर पर है। आरोप है कि अगस्ता वेस्टलैंड कंपनी ने 14 हेलीकॉप्टर का सौदा अपने पक्ष में कराने के एवज में मिशेल को 225 करोड़ रुपये दिए थे, जो रिश्वत के बतौर भारतीय नेताओं और नौकरशाहों में बांटे गए। जब रिश्वत देने का मसला सामने आया तब जनवरी 2014 में यह सौदा रद्द कर दिया गया था। उम्मीद है कि मिशेल से पूछताछ में अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर्स खरीद घोटाले में भ्रष्टाचार की बातें प्याज की परत की तरह एक-एक कर उघड़ कर सामने आएंगी। ऐसे नेताओं और नौकरशाहों के नाम भी सामने आ सकते हैं, जो नहीं चाहते थे कि मिशेल का प्रत्यर्पण हो।

अपने संपादकीय ‘विचाराधीन कैदियों का प्रश्न’ के द्वारा नई दुनिया कहता है कि संभव है कि सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता के चलते कुछ समय बाद विचाराधीन कैदियों की संख्या में कमी आए।

सुप्रीम कोर्ट ने विचाराधीन कैदियों की भारी-भरकम संख्या को लेकर चिंता जताते हुए उनके मामलों का जल्द निपटारा करने के लिए जरूरी कदम उठाने पर बल तो दिया, लेकिन इसमें संदेह है कि केवल ऐसा कहने से बात बनेगी। जेलों में कैदियों की अमानवीय स्थितियों पर विचार कर रहे सुप्रीम कोर्ट ने यह पाया है कि देश की जेलों में क्षमता से अधिक कैदी होने का एक बड़ा कारण विचाराधीन कैदियों का होना है। एक आंकड़े के अनुसार करीब 67 प्रतिशत कैदी विचाराधीन हैं। विचाराधीन कैदियों का यह प्रतिशत न्याय प्रक्रिया पर भी एक गंभीर सवाल है।

उन विचाराधीन कैदियों को रिहा करने के बारे में कोई ठोस फैसला लिया जाए जो मामूली अपराध में लिप्त होने के आरोप में सलाखों के पीछे हैं। कम से कम उन विचाराधीन कैदियों को तो प्राथमिकता के आधार पर राहत मिलनी ही चाहिए, जो उस अवधि को पार कर चुके हैं जो उन्हें सजा मिलने पर जेल में गुजारनी पड़ती। ऐसी ही प्राथमिकता का परिचय उन विचाराधीन कैदियों को राहत देने के मामले में भी किया जाना चाहिए, जो जमानत राशि न चुका पाने के कारण जेलों में सड़ रहे हैं। इस मामले में राज्य सरकारों को सक्रियता और संवेदनशीलता दिखाने की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट ने विचाराधीन कैदियों संबंधी समीक्षा समितियों को अगले साल की पहली छमाही तक हर माह बैठक करने को कहा है, लेकिन इन मासिक बैठक करने वालों से यह भी अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे विचाराधीन कैदियों को राहत देने वाले उपायों तक पहुंचें। यह न्यायिक प्रक्रिया की शिथिलता का ही दुष्परिणाम है कि मौजूदा अथवा पूर्व विधायकों और सांसदों के खिलाफ चार से हजार से अधिक मामले चल रहे हैं। इनमें से कई तो दशकों से चल रहे हैं। करीब आधे मामले ऐसे हैं, जिनमें आरोप पत्र ही दायर नहीं हो सके हैं। आखिर ऐसे कितने मौजूदा अथवा पूर्व जनप्रतिनिधि हैं, जो विचाराधीन कैदी के रूप में जेलों में हैं? अगर उनकी संख्या न्यून है तो क्या इस कारण नहीं कि वे अपने प्रभाव का बेजा इस्तेमाल करने में समर्थ हैं? इन नेताओं के खिलाफ कई मामले ऐसे हैं, जो बेहद संगीन हैं और जिनमें उन्हें आजीवन कारावास की भी सजा हो सकती है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा एवं पूर्व जनप्रतिनिधियों के आपराधिक मामले विशेष अदालतों के हवाले करने के जो आदेश दिए थे, उस पर अमल शुरू हो गया है, लेकिन इसी के साथ ऐसी व्यवस्था बनाने की भी तो जरूरत है कि हर किसी के मामले का निस्तारण तेज गति से और एक निश्चित समयसीमा में हो।