12.02.2019

देश के विभिन्न समाचार पत्रों ने विविध विषयों पर संपादकीय लिखे हैं और साथ ही कुछ सुर्खियां भी ध्यान आकर्षित करती हैं। भारत 2030 तक दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। जनसत्ता सहित कई अखबारों ने ग्रेटर नोएडा में पेट्रोलियम उद्योग के वैश्विक सम्मेलन पेट्रो टेक 2019 में प्रधानमंत्री के इस आश्वासन को प्रमुखता दी है।

नवभारत टाइम्स ने रोटी, धरना और कमान शीर्षक से राजनीतिक गलियारे के अलग-अलग रंग पेश किए हैं। पत्र ने वृ्ंदावन में प्रधानमंत्री द्वारा एक कार्यक्रम में बच्चों को खाना परोसने, आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा दिलाने की मांग पर दिल्ली में अनशन पर मुख्यनमंत्री चन्द्रबाबू नायडू के बैठने और रोड शो करके प्रियंका के राजनीति में कदम रखने को सचित्र प्रकाशित किया है।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को उच्चतम न्यायालय के आदेश पर दैनिक जागरण की सुर्खी है – अल्पसंख्यकों की परिभाषा और पहचान पर तीन महीने में हो फैसला। आम्रपाली समूह के पांच सितारा होटल सहित दो सम्पत्तियों की नीलामी में सुप्रीम कोर्ट को गुटबंदी का संदेह- अमर उजाला की खबर है।

हिन्दुस्तान के आर्थिक पन्नेर की खबर है – वस्त्र परिधान निर्माण पर कर खत्म करने की तैयारी वित्त मंत्रालय की हरी झंडी के बाद कैबिनेट से मंजूरी का इंतजार। गुर्जर आंदोलन से रेलवे को तीन दिन में तीन सौ करोड़ का हुआ नुकसान। राजस्थान पत्रिका ने लिखा है – मालगाडि़यों के रद्द होने से सबसे ज्यादा असर।

सेमी हाई स्पीड ट्रेन वंदेभारत का किराया होगा एक हजार आठ सौ पचास रुपए से तीन हजार पांच सौ बीस रुपए तक। दैनिक भास्कर ने बताया है 15 फरवरी को दिल्ली से वाराणसी के लिए रवाना होगी ट्रेन। मिशन गगनयान-इसरो ने दी एयरफोर्स को जिम्मेदारी। हरिभूमि के अनुसार – अंतरिक्ष यात्रियों को प्रशिक्षित करेगी वायुसेना। दस केंडिडेट को मिलेगा प्रशिक्षण जिसमें से अंतरिक्ष मिशन के लिए होगा तीन का चयन।

राष्ट्रीय सहारा अपने संपादकीय में ‘चीन की शरारत’ शीर्षक से लिखता है कि भारत के पड़ोसी कम्युनिस्ट चीन ने अपनी पुरानी साम्राज्यवादी नीतियों को जारी रखते हुए प्रधानमंत्री मोदी के अरुणाचल प्रदेश के दौरे का यह कहते हुए विरोध जताया है कि यह विवादित इलाका है, और यहां किसी भी तरह की गतिविधि से सरहद के सवाल जटिल हो सकते हैं। हालांकि भारत के विदेश मंत्रालय ने चीन की आपत्ति पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की है कि अरुणाचल भारत का अभिन्न अंग है और भारतीय नेता समय-समय पर यहां जाते रहते हैं, जैसा कि भारत के अन्य राज्यों में जाते हैं। चीन और भारत के बीच मैकमोहन रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा माना जाता है, लेकिन चीन इसे स्वीकार नहीं करता है, और यह दावा करता है कि लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश भारत के नहीं, बल्कि चीन के हिस्से हैं। इसीलिए जब भी भारत का कोई नेता अरुणाचल प्रदेश के दौरे पर जाता है, तो चीन अपनी आपत्ति जताता है। 2009 से भारतीय इलाकों में चीनी सैनिकों की घुसपैठ की आवृत्ति बढ़ी है। पिछले साल चीनी सैनिकों ने 170 बार और 2017 में करीब साढ़े चार सौ बार भारतीय सीमा में घुसपैठ करने की कोशिश की है। चीन समझता है कि एक झूठ को बार-बार दोहराने से वह सच में तब्दील हो जाता है, लेकिन उसे यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि अरुणाचल और लद्दाखके मामले में भारत का पक्ष मजबूत है, इसलिए उसके नापाक मंसूबे कभी पूरे नहीं होंगे।

जनसत्ता अपने संपादकीय में ‘अदालत की भाषा‘ शीर्षक से लिखता है कि हमारे यहां अदालत की भाषा को लेकर अनेक मौकों पर सवाल उठते रहे हैं कि यह आम आदमी की समझ से परे है । कई बार यह भी मांग उठी कि उच्च अदालतों में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी मुकदमें दायर करने और फैसले सुनाने का प्रावधान होना चाहिए। मगर इस मामले में अभी तक कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकल पाया है। जबकि अबू धाबी सरकार ने अपने यहां अरबी और अंग्रेज़ी के अलावा हिंदी को भी अदालतों की तीसरी आधिकारिक भाषा की मान्यता दे दी है । अबू धाबी में करीब तीस फीसद भारतीय रहते हैं। इन लोगों को शिकायतें, दावे और अनुरोध पेश करने में सुविधा हो और अदालती कार्यवाही में सहूलियत तथा न्यायिक सेवा के लिए नजीर हो सकता है। भारत की निचली अदालतों में तो कामकाज स्थानीय भाषा में होता है, पर उच्च और उच्चतम न्यायालय में अंग्रेज़ी ही मुख्य भाषा है। ऐसा नहीं कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं में कानून की पढ़ाई नहीं होती या इन भाषाओं में कानून संबंधी तकनीकि शब्दावली का विकास नहीं हुआ है। पर ब्रिटिश ज़माने से सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेज़ी बनी हुई है। अदालत का कामकाज इस तरह होना चाहिए कि वह केवल जज और वकील के बीच का संवाद बन कर न रह जाए, उसमें वादी और प्रतिवादी की भी हिस्सेदारी होनी चाहिए। मगर वह केवल कुछ गवाहियों तक सीमित रह जाती है। बाकी समय लोगों को समझ ही नहीं आता कि उनके मुकदमें में क्या हो रहा है। फिर जब फैसला आता है, तो वे उसे खुद पढ़ कर समझ तक नहीं सकते, किसी वकील या कानून के जानकार व्यक्ति से मदद लेनी पड़ती है। अबू धाबी से नजीर लेकर भारत में भी आम आदमी की भाषा को अदालत की भाषा बनाने का प्रयास होना चाहिए।