13.02.2019

आज के समाचार पत्रों ने कई विषयों पर संपादकीय लेख लिखे हैं । वहीं समाचार पत्रों की सुर्खियां भी ध्यान आकर्षित करती हैं ।
दिल्ली के करोलबाग में होटल में लगी आग का कहर आज अधिकांश अखबारों की बड़ी सुर्खी बना है। नवभारत टाइम्स ने नियमों की अनदेखी पर सवाल उठाया है। जनसत्ता ने घटना के बाद जांच की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा को सौंपने की खबर दी है। दैनिक भास्कर लिखता है- लापरवाही इतनी की आग की सूचना भी एक घंटे बाद दी गई।
देशबंधु के शब्द हैं- मंज़र देख खौफ में दिल्ली वाले।
सीबीआई के पूर्व अंतरिम निदेशक पर अदालत की अवमानना के लिए कल दिन भर अदालती कक्ष में बैठकर सजा काटने को लगभग सभी अखबारों ने पहले पन्ने पर दिया है। हरिभूमि ने लिखा है- दिनभर अदालत के कोने में बैठे रहे राव। नवभारत टाइम्स लिखता है- राव को माफी नहीं दिनभर अदालत में बैठने की सजा ।
राष्ट्रीय सहारा ने लिखा है- ट्राई ने रूचि के हिसाब से चैनल चुनने के लिए 31 मार्च तक का समय दिया है। इकनॉमिक टाइम्स ने इसे उपभोक्ताओं के लिए राहत बताया है।
दैनिक ट्रिब्यून ने लिखा है- फिर बदलेगा मौसम ओलावृष्टि की आशंका । अगले दो तीन दिनों में मैदानी इलाकों में बारिश की चेतावनी।
दैनिक जागरण ने दसवीं और बारहवीं कक्षा के बच्चों के प्रवेश पत्र पर अनिवार्य रूप से अभिभावकों के हस्ताक्षर होने की खबर दी है। अखबार लिखता है- हस्ताक्षर न होने पर परीक्षा में बैठने से रोका जा सकता है। जनसत्ता की खबर है- सीबीएसई ने कहा – दस बजे के बाद किसी भी हालत में परीक्षा केन्द्र में प्रवेश नहीं।

समाचार पत्र हिन्दुस्तान “सीबीआई को सबक” शीर्षक से अपने संपादकीय में लिखता है कि सीबीआई के लिए वह बेहद शर्मनाक पल था । तमाम विवादों में फंसी सीबीआई को एक और धक्का लगा । सुप्रीम कोर्ट ने उसके अंतरिम निदेशक रहे नागेश्वर राव और कानूनी सलाहकार को कोर्ट की अवमानना का दोषी पाया । उन पर एक लाख रुपये का जुर्माना ही नहीं किया गया बल्कि दिन भर कोर्ट में बैठे रहने की सज़ा भी सुनाई गई । असल में अंतरिम निदेशक के पद पर रहते हुए नागेश्वर राव ने मुजफ्फरपुर बालिका गृह की जांच से जुड़े अहम अधिकारी अरुण कुमार शर्मा का तबादला कर दिया था । पिछले अक्तूबर में कोर्ट ने आदेश दिया था कि जब तक जांच चल रही है उससे जुड़े किसी अधिकारी का तबादला न किया जाए । कोर्ट का कहना था कि उनके आदेश के बावजूद नागेश्वर राव ने तबादला करने में जल्दबाज़ी दिखाई । मुजफ्फरपुर मामला बेहद नाजुक मोड़ पर है । कोर्ट का मानना था कि जान-बूझकर उसके आदेश की अवहेलना की गई ।
एक अधिकारी के तौर पर नागेश्वर राव की छवि कोई बहुत बेहतर नहीं रही है । उनका करियर विवादों से घिरा रहा है । उन्हें जब केंद्र सरकार ने अंतरिम निदेशक बनाया था । तब भी कई कोनों से फुसफुसाहट हो रही थी । सीबीआई की ही तरह उनके कामकाज पर ढेरों सवाल उछलते रहे हैं । वैसे भी सीबीआई लगातार विवादों में बनी रही है । उसे लेकर तमाम सवाल जब-तब उठते ही रहे हैं । वह एक तटस्थ जांच एजेंसी है यह भरोसा तो उस पर कभी नहीं जमा । एक आरोप उस पर लगातार लगता रहा है कि वह सरकार के तोते की तरह है । सरकार जैसा चाहती है उसे इस्तेमाल कर लेती है ।
समाचार पत्र राष्ट्रीय सहारा “अल्पसंख्यक कौन” शीर्षक से अपने संपादकीय में लिखता है कि सर्वोच्च न्यायालय का अल्पसंख्यक की पहचान संबंधी नया आदेश काफी महत्त्वपूर्ण है । हालांकि इससे संबंधित याचिका पर न्यायालय ने कोई मत नहीं दिया है पर उसने याचिकाकर्ता से राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में प्रतिवेदन देने के साथ कहा है कि आयोग तीन महीने के अंदर अपना मत दे । याचिका में अपील की गई थी कि सर्वोच्च न्यायालय अल्पसंख्यक की परिभाषा नये सिरे से तय करे । हिंदू राष्ट्रीय स्तर पर बहुसंख्यक हैं लेकिन कई राज्य हैं जहां अल्पसंख्यक हैं । बावजूद इसके वहां उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा हासिल नहीं है । न्यायालय ने आयोग से पूछा है कि देश में बहुसंख्यक होने के बावजूद एक समुदाय किसी राज्य में अल्पसंख्यक है तो क्या उसे उस राज्य में माईनॉरटी का दर्जा दिया जा सकता है सच है कि 2011 की जनगणना के अनुसार लक्षद्वीप, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब में हिंदू समुदाय अल्पसंख्यक हैं । तो अगर राष्ट्रीय स्तर पर आबादी के अनुसार किसी को अल्पसंख्यक का दर्जा और संबंधित सारे लाभ मिलते हैं तो राज्य के स्तर पर यही उनके साथ होना चाहिए जो वहां अल्पसंख्यक हैं ।