अंतरराष्ट्रीय सहयोग द्वारा आतंकवाद का सामना l

पिछले सप्ताह जम्मू कश्मीर के पुलवामा में केंद्रीय आरक्षित पुलिस बल के काफ़िले पर किए गए भयानक आतंकी हमले में चालीस पुलिसकर्मी मारे गए और कई घायल हो गए l पाकिस्तान आधारित आतंकी गुट जैश-ए-मोहम्मद या जैश ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली है l इस घटना ने आतंकरोध के लिए प्रभावी अंतरराष्ट्रीय सहयोग की ज़रूरत को फिर से उजागर किया है l

एक सक्रिय लोकतंत्र होने के नाते भारत को अपने राज्यक्षेत्र के भीतर आतंकरोध के लिए अपनी शासकीय नीतियों पर भरोसा है लेकिन सीमा पार से होते आतंकी हमलों को देखते हुए भारत पहले से ही आतंकरोध के लिए प्रभावी अंतरराष्ट्रीय सहयोग का समर्थन करता आया है l

 संयुक्त राष्ट्र की महासभा में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मलेन पर होने वाली चर्चा इसका प्रमाण है l प्रस्तावित सम्मलेन के समझौते में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य राष्ट्रों के लिए अपराधी को सज़ा देने या उसे प्रत्यर्पित करने के वैधानिक सिद्धान्तों पर मंज़ूरी शामिल है l इसे स्वीकार करने का विरोध करने वाले देशों में पाकिस्तान सबसे ऊपर है l अमरीका पर वर्ष 2001 में हुए 9/11 आतंकी हमलों के बाद से आतंकरोध के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् सक्रिय भूमिका निभा रही है l इस सन्दर्भ में परिषद् अपने प्रस्तावों पर भरोसा करती है जो इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य राष्ट्रों पर लागू होते हैं और संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र के अंतर्गत आते हैं l परिषद् के पाँच स्थाई सदस्य अपनी वीटो शक्ति या विशेषाधिकार द्वारा फैसले लेते हैं l सुरक्षा परिषद् के उपायों में विस्तृत आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबन्ध, हथियारों से जुड़े सरकारी प्रतिबंध सूची में शामिल समूहों या व्यक्तियों पर लगाये जाने वाले वित्तीय या वस्तुपरक प्रतिबंध शामिल हैं l

पाकिस्तान आधारित लश्कर-ए-तैय्यबा या लेट द्वारा 26 नवम्बर 2008 को मुंबई पर किए गए आतंकी हमलों के बाद भारत के सन्दर्भ में आतंकरोध मामले में सुरक्षा परिषद् का प्रभाव वास्तविक परीक्षा थी l परिषद् ने लश्कर-ए-तैय्यबा के सरगना हाफ़िज़ सईद और ज़ाकिर रहमान लखवी को 10 दिसंबर 2008 को प्रतिबंध उपाय सूची में शामिल किया था l हालांकि मुंबई आतंकी हमले के दस वर्षों से भी अधिक समय बाद आज भी सूचीबद्ध इन व्यक्तियों पर सुरक्षा परिषद् द्वारा प्रतिबंध लगवाने की भारत की कोशिशें सफल नहीं हुई हैं l इस की वजह पाकिस्तान द्वारा इन प्रवर्तन उपायों को न मानना और चीन द्वारा इस सन्दर्भ में उसे दिया जाने वाला कड़ा समर्थन है l

जैश-ए-मोहम्मद का सरगना, मसूद अज़हर दो अन्य आतंकियों के साथ दिसंबर 1999 में 155 भारतीय नागरिकों के बदले अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को सौंपा गया था l इंडियन एयरलाइन्स की उड़ान संख्या –आई-सी-814 में इन नागरिकों का अपहरण कर लिया गया था l पुलवामा हमले की ज़िम्मेदारी लेने वाले जैश-ए-मोहम्मद को अफ़ग़ानिस्तान में अंतरराष्ट्रीय बलों और अफ़ग़ानी बलों के ख़िलाफ़ अलक़ायदा और तालिबान के साथ मिलकर आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने और अन्य कारणों के चलते अक्टूबर 2001 से ही सुरक्षा परिषद् प्रतिबन्ध कार्यवाही के लिए लक्षित किया जा रहा है l इसने अक्टूबर 2001 में श्रीनगर की विधानसभा और दिसंबर 2001 में नई दिल्ली की संसद सहित भारत के लोकतान्त्रिक संस्थानों पर आतंकी हमले किए हैं l

जनवरी 2016 में पठानकोट हवाईअड्डे और सितम्बर 2016 में उरी में किए गए जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी हमलों के बाद सुरक्षा परिषद् के अधिकतर सदस्यों ने इसका समर्थन किया था कि जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर को सुरक्षा परिषद् की प्रतिबंध सूची में शामिल करने का भारत का अनुरोध मान लिया जाये l इस प्रयास को चीन परिषद् में बार बार रोक देता है l

आतंकरोध में प्रभावी बनने के लिए ये ज़रूरी है कि सुरक्षा परिषद् कड़े प्रयासों द्वारा व्यक्तियों और इकाइयों को अपनी प्रतिबंध कार्यवाही सूची में शामिल करे l इससे वर्तमान समय में परिषद् के प्रस्तावों का उल्लंघन करने वाले देश एकदम अलग-थलग पड़ जायेंगे l लेकिन मौजूदा समय में सुरक्षा परिषद् द्वारा ऐसा किए जाने की संभावना कम लगती है lपरिषद् एशिया और अफ्रीका में इसके आदेशपत्र के अंतर्गत तैनात किए गए संयुक्त राष्ट्र शांतिकर्मियों को निशाना बनाने वाले आतंकियों के ख़िलाफ़ कार्यवाही करने में भी विफल रही है l

 पुलवामा हमले का दावा करने वाले जैश-ए-मोहम्मद पर कार्यवाही करने के सन्दर्भ में परिषद् के पाँच सदस्यों के विशेषाधिकारों में एक राय नहीं है l अमरीका, रूस और फ्रांस ने जैश-ए-मोहम्मद की जहाँ अधिकारिक निंदा की है, वहीँ चीन और ब्रिटेन इस सन्दर्भ में खामोश है l

भारत के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के माध्यम से आतंकरोध पर प्रभावी अंतरराष्ट्रीय सहयोग, 2005 में विश्व नेताओं  द्वारा आज्ञापित परिषद् के शीघ्र सुधारों के लागू होने के साथ शुरू हो सकेगा l इस से फ़ैसलों को लागू करने की क्षमता और इसका प्रभाव तथा वैधानिकता बढ़ेगी l

आलेख : राजदूत असोके मुकेर्जी, संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व स्थाई प्रतिनिधि l

अनुवाद : नीलम मलकानिया