14.03.2019

आज के समाचार पत्रों ने विभिन्न विषयों पर संपादकीय लिखे हैं वहीँ समाचार पत्रों की सुर्खियाँ भी ध्यान आकर्षित करती हैं |

पाकिस्तान के जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने में चीन का फिर अड़ंगा अखबारों की बड़ी ख़बर है। हिंदुस्तान की सुर्खी है- अज़हर को चीन ने फिर बचाया, संयुक्त राष्ट्र में वैश्विक आतंकी घोषित करने के प्रयास को वीटो किया। जनसत्ता ने विदेश मंत्रालय के हवाले से लिखा है- उपलब्ध विकल्पों पर काम होता रहेगा।

पुलवामा आतंकी हमले के आज एक महीना पूरा होने पर दैनिक भास्कर की सुर्खी है -कश्मीर में एक महीने में जैश के एक तिहाई आतंकी ढेर, अब भी बचे हैं 38 आतंकी। सीमा पर तनाव शीर्षक से अमर उजाला का कहना है पुंछ में पाकिस्तान के दो लड़ाकू विमानों की घुसपैठ नाकाम। मंगलवार रात नियंत्रण रेखा से दस किलोमीटर की दूरी पर देखे गए,साउंड बैरियर को भी तोड़ा।

इधर, दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग की भूमिका पर राजस्थान पत्रिका लिखता है-दिल्ली में पाकिस्तान का उच्चायोग मुहैया कराता था आतंकियों को धन। हवाला के 200 करोड़ रुपए की हो रही है जांच। एन.आई.ए के बाद अब प्रवर्तन निदेशालय को भी मिले सबूत। दुबई से भेज रहे पैसा। छात्र हैं निशाने पर। एनआईए ने कहा, पाकिस्तान जम्मू कश्मीर में बच्चों के लिए फैलोशिप कार्यक्रम के नाम उन्हें आतंक की राह पर बढ़ने में कर रहा है मदद। पाकिस्तान उच्चायोग अलगाववादी नेताओँ के संपर्क में।

चुनाव की सरगर्मी अख़बारों के मुख पृष्ठ पर है। दैनिक ट्रिब्यून लिखता है-पूर्वोत्तर में भाजपा ने छह दलों से मिलाया हाथ। दैनिक भास्कर की टिप्पणी है- कही गठबंधन तो कहीं गठबंधन के प्रयास, यूपी, महाराष्ट्र से कांग्रेस के 21 प्रत्याशी तय, कर्नाटक में जेडीएस से सीटों का बंटवारा। जनसत्ता लिखता है-हरियाणा में गठबंधन के प्रस्ताव पर आप को कांग्रेस ने दिखाया अंगूठा।

 “अधिक मतदान का आग्रह” शीर्षक से जागरण अपने संपादकीय में लिखता है कि

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बड़ी संख्या में मतदान की ज़रुरत पर बल देते हुए विभिन्न क्षेत्रों के जाने-माने लोगों से वोट के लिए जागरूकता बढ़ाने का जो आग्रह किया उसका कुछ न कुछ असर दिखना ही चाहिए | यह अच्छा हुआ कि उन्होंने यह आग्रह अपने जिन राजनीतिक विरोधियों से किया उनमें राहुल गाँधी, ममता बनर्जी आदि भी हैं | ऐसा करके उन्होनें एक राजनेता वाला काम किया है | अधिक मतदान लोकतंत्र को मजबूती देने के साथ ही जनता की अकांक्षाओं की वास्तविक तस्वीर भी पेश करता है | मतदान लोकतंत्र में भागीदारी का अवसर मात्र ही नहीं, देश की दशा-दिशा तय करने में आम आदमी के योगदान का भी परिचायक है | अधिक मतदान के लिए माहौल बनाने की आवश्यकता इस लिए है, क्योंकि देश के कुछ हिस्सों में मतदान प्रतिशत अपेक्षा से कहीं कम होता है |

          यदि सेना और अर्धसैनिक बालों के जवानों के साथ-साथ चुनाव ड्यूटी में शामिल लोगों के लिए वोट देने की व्यवस्था हो सकती है तो अन्य लोगों के लिए क्यों नहीं हो सकती ? एक ऐसे समय जब विदेश में रह रहे भारतीयों को भारत आये बगैर वोट देने की सुविधा देने की तैयारी हो रही है तब फिर ऐसा कुछ किया ही जाना चाहिए जिससे वे आम भारतीय भी मतदान कर सकें जो अपने निर्वाचन क्षेत्र से बाहर होते हैं | इस बार न सही, अगली बार ऐसी किसी व्यवस्था के निर्माण के लिए निर्वाचन आयोग के साथ सरकार का भी सक्रिय होना समय की मांग है |

राष्ट्रीय सहारा अपने संपादकीय में “नवीन ने दिखाई राह” शीर्षक से लिखता है कि
ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने आगामी लोक सभा चुनावों में अपनी पार्टी के कुल उम्मीदवारों में 33 फीसद सीटें महिलाओं को देने की जो राह दिखाई  है, वह अब रफ्तार पकड़ने लगी है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी सूबे की 42 सीटों के लिए जो उम्मीदवार घोषित की हैं, उनमें 17 महिलाएं हैं। यह आकंड़ा 41 फीसद है। महिलाओं को लोक सभा और विधान सभा में 33 फीसद आरक्षण देने का विधेयक दो दशक से ठंडे बस्ते में है। कांग्रेस, भाजपा सहित अन्य राजनीतिक दल इस मसले पर मतैक्य नहीं बना पा रहे हैं। हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कहा है कि यदि इस बार पार्टी की सरकार बनती है तो महिला आरक्षण लागू किया जाएगा। उम्मीद की जाती है कि महिला सशक्तीकरण की जो बयार देश के पूर्वी राज्यों से चली है, उसका प्रभाव केंद्र और अन्य राज्यों पर भी पड़ेगा।

           यह संकेत है कि यदि राजनीति और शासन को सुशासन में तब्दील करना है, इसमें गुणात्मक सुधार लाना है तो राजनीतिक दलों को पंचायत से लेकर विधानसभाओं और लोक सभा में 50 फीसद सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करनी चाहिए। लेकिन यहां ध्यान रखना चाहिए कि सही मायने में समाजसेवा का रुझान रखने वाली महिलाओं का चयन किया जाना चाहिए और रुपये-पैसे के बल पर राजनीति में उतरने की इच्छा रखने वाली महिलाओं को हतोत्साहित भी किया जाना चाहिए। दरअसल, महिला आरक्षण कानून की उपस्थिति में ज़्यादातर राजनीतिक पार्टियां महिलाओं को उम्मीदवार बनाने से डरती है क्योंकि बाहुबल के अभाव में उनके जीतने की संभावना कम रहती है।

आलेख : हिंदी एकांश, विदेश प्रसारण प्रभाग