25.03.2019

देश भर से प्रकाशित आज के हिंदी समाचार पत्रों ने विविध विषयों पर अपने संपादकीय लेख लिखे हैं। साथ ही अन्य समाचारों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है।

पाकिस्तान में दो हिन्दू लड़कियों के अपहरण का मामला अखबारों की बड़ी खबर है। जनसत्ता की सुर्खी है सुषमा और पाकिस्तान के मंत्री में तकरार। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा- भारतीय उच्चायुक्त से केवल रिपोर्ट मांगने पर पाकिस्तान के मंत्री की घबराहट से पता चलता है कि वे अपराध बोध से ग्रस्त हैं।

नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान को करारा जबाव दिए जाने पर अमर उजाला लिखता है- चौकी उड़ाई, दस पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, तबाह चौकी पर दिखा पाकिस्तान का उल्टा झंडा, गोलाबारी में एक भारतीय जवान भी शहीद। पुलवामा हमले पर पंजाब केसरी का कहना है- आतंकियों ने इस्तेमाल किया था वर्चुअल सिम। वर्चुअल सिमटेक्नोलॉजी में कंप्यूटर पर जनरेट होता है टेलीफोन नम्बर और उपयोगकर्ता सेवा प्रदाता के ऐप के जरिए करता है इसका उपयोग

दैनिक जागरण अपने संपादकीय में “अमीर होते जनप्रतिनिधि” शीर्षक से लिखता है कि भाजपा ने राहुल गांधी की संपत्ति को लेकर उन पर जो आरोप लगाए उनकी सत्यता पर कुछ कहना कठिन है, लेकिन यह बात हैरान तो करती ही है कि 2004 में 55 लाख की जमीन-जायदाद के मालिक 2014 में नौ करोड़ की संपदा के स्वामी कैसे हो गए? यह सवाल इसलिए और चकित करता है, क्योंकि सब जानते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष न तो कोई कारोबारी हैं और न ही डॉक्टर या वकील। पता नहीं भाजपा की ओर से जो सवाल उछाला गया उसका कोई संतोषजनक जवाब मिलेगा या नहीं, लेकिन ऐसे जवाब केवल राहुल गांधी से ही अपेक्षित नहीं हैं। ऐसे न जाने कितने सांसद हैं जो एक कार्यकाल में ही अप्रत्याशित तरीके से अमीर हो जाते हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति विधायकों के मामले में भी देखने को मिलती है। जब ऐसे विधायक या सांसद दिन दूनी रात चौगुनी आर्थिक तरक्की करते हैं तब कहीं अधिक संदेह होता है जो न तो कारोबारी होते हैं और न ही राजनीति के अलावा और कुछ करते हैं।

               शायद इसी कारण हाल में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताई थी कि बेहिसाब संपत्ति अर्जित करने वाले जनप्रतिनिधियों पर निगाह रखने के लिए कोई स्थाई तंत्र क्यों नही बनाया गया है? ऐसा कोई तंत्र बनना समय की मांग है, क्योंकि किसी आम आदमी या फिर कारोबारी की संपत्ति में तनिक भी असामान्य उछाल दिखने पर उसे आयकर विभाग के सवालों से दो-चार होना पड़ता है। आखिर विधायक और सांसद विशिष्ट क्यों हैं? कानून की निगाह में राजा और रंक एक ही होने चाहिए। बेहतर हो कि लोकपाल भी इस सवाल पर विचार करे कि कुछ सांसद इतने कम समय में ही अत्यधिक अमीर कैसे हो जाते हैं?

उम्र और परिपक्वता शीर्षक से हिंदुस्तान अपने संपादकीय में लिखता है कि इंसान कब परिपक्व होता है या परिपक्वता की सही उम्र क्या है? ब्रिटेन के मनोवैज्ञानिकों के ताज़ा शोध के नतीजे न केवल चौंकाते हैं, बल्कि सोचने पर विवश भी करते हैं। उनका मानना है, हमें 18 की उम्र में भले ही वयस्क मान लिया जाए, लेकिन हमारा मस्तिष्क 30 की उम्र तक परिपक्वता अर्जित करता है। भारत की बात करें, तो 18 की उम्र में ही वाहन चलाने का लाइसेंस, मतदान का अधिकार, सेना में भर्ती होने का मौका मिलता है, एक बालिग के रूप में सारे कानूनी अधिकार मिलते हैं। बेटा या बेटी 18 की उम्र के होते हैं, तो यह मान लिया जाता है कि वे अपनी मर्जी के मालिक हैं। लेकिन सावधान! ज़रूरी नहीं कि वे इसी उम्र में परिपक्व हो जाएं। ब्रिटेन में चल रहा शोध इशारा करता है कि 18 की उम्र भले ही वयस्क वैधता का एक पड़ाव हो, लेकिन परिपक्वता के लिए तो इंतज़ार करना पड़ता है। हमारे समाज में परंपरागत रूप से देखें, तो प्रजनन शक्ति अर्जित करते ही इंसान को परिपक्व मान लिया जाता है, किंतु विज्ञान यह पहले ही सिद्ध कर चुका है कि प्रजनन शक्ति या क्षमता का मस्तिष्क की परिपक्वता से कोई लेना-देना नहीं है |

       पश्चिमी देशों में यह मांग भी होती रही है कि 30 की उम्र तक अपराधियों को अलग ढंग से देखा जाए। वास्तव में किसी ऐसे ठोस नतीजे पर पहुंचने से पहले हमें मस्तिष्क की अनछुई कंदराओं को और पुख्ता तौर पर खंगालना होगा। बेशक, मस्तिष्क को हम जितना जानेंगे, हम उतने ही मानवीय होते चले जाएंगे।

आलेख : हिंदी एकांश, विदेश प्रसारण प्रभाग