गोलान हाइट्स के संदर्भ में अमरीका के रवैये में बड़ा बदलाव

अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प मात्र 35 शब्दों वाले एक ट्वीट से इस्राइल के प्रति अमरीकी नीति में एक बड़ा बदलाव लाए हैं। गोलान हाइट्स के बारे में लगभग आधी सदी की सिलसिलेवार अमरीकी स्थिति से अलग रवैया अपनाया जा रहा है। श्री ट्रम्प ने 1967 के युद्ध के दौरान इस्राइल द्वारा कब्ज़ाए गए 500 वर्ग मील के सीरियाई भू-भाग को इस्राइल के हिस्से के तौर पर विस्तारित मान्यता दे दी है।

हालांकि ये ट्वीट एक छोटे से भू-भाग पर इस्राइली संप्रभुता का ट्रम्प प्रशासन द्वारा समर्थन किए जाने की सोची-समझी योजना की पुष्टि भर है। ये भू-भाग पचास से अधिक वर्षों से वैसे भी इस्राइल के ही नियंत्रण में था।

फ़रवरी माह में तीन अमरीकी सीनेटरों और एक काँग्रेसमैन ने सीनेट और प्रतिनिधि सभा में   गोलान हाइट्स पर इस्राइली संप्रभुता को मान्यता देता विधेयक पेश किया था। अमरीकी विदेश मंत्रालय ने भी अपनी मानवाधिकार रिपोर्ट में अधिकृत गोलान हाइट्स शब्दों की बजाय इस्राइल प्रशासित गोलान हाइट्स शब्द इस्तेमाल कर के ऐसा ही संकेत दिया था।

ट्रम्प प्रशासन की रणनीति उस समय भी पता चली थी जब राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने विदेश मंत्री की इस्राइल यात्रा के दौरान गोलान हाइट्स पर इस्राइली संप्रभुता को मान्यता देने के लिए अपने ट्वीट का प्रयोग किया था। इस घोषणा का समय पहले से सोचा गया था। ऐसा अचानक ही नहीं हो गया कि इस्राइल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहु की वाशिंगटन, डी.सी. की निर्धारित यात्रा से कुछ दिन पहले ही राष्ट्रपति ट्रम्प की गोलान हाइट्स के बारे में की गई घोषणा सुर्ख़ियों में है।

कुछ लोगों का तर्क है कि अमरीकी नीति में ये अभूतपूर्व बदलाव 9 अप्रैल 2019 को इस्राइल के आगामी चुनावों में श्री नेतन्याहु की उम्मीदवारी को बढ़ावा देने के लिए है। हालांकि अमरीकी राष्ट्रपति ने बहुत पहले ही ये संकेत दे दिया था कि उन की इस्राइल नीति उन के पूर्वाधिकारियों से अलग होगी। जेरुशलम को इस्राइल की राजधानी के रूप में मान्यता देकर 2017 में उन्होंने ऐसा किया भी था।

श्री ट्रम्प के फ़ैसले पर अपेक्षित रूप से पूरे राजनीतिक परिदृश्य में और इस्राइल के विभिन्न दलों से अच्छी-ख़ासी प्रतिक्रिया मिली। बहुत से इस्राइली नेता कई वर्षों से अमरीका को ऐसा करने के लिए प्रभावित करने की कोशिश करते आ रहे थे। लेकिन अरब देशों की ओर से प्रतिकूल प्रतिक्रिया से बचने के लिए, संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का सम्मान करने के लिए और पश्चिम एशिया शांति प्रक्रिया में शांति क्षेत्र का सिद्धांत बनाए रखने के लिए पिछले अमरीकी राष्ट्रपति ऐसा करना टालते रहे।

बहुत से अरब देशों में राजनीतिक उथल-पुथल, सीरिया में गृह युद्ध जैसी हालत और इस्राइल के प्रति एक वैकल्पिक नीति के अपने संकल्प के चलते राष्ट्रपति ट्रम्प ने ये फ़ैसला लिया।

पश्चिम एशिया और युरोप में श्री ट्रम्प की नीति पर तीखी प्रतिक्रिया मिली। सीरिया ने तुरंत संकल्प लिया कि ये गोलान हाइट्स को वापिस पाने की हर संभव कोशिश करेगा। 1967 के युद्ध के दौरान इस्राइल ने इस पर कब्ज़ा किया था और 1981 में इसका विलयन किया था। तुर्की, रूस और ईरान ने भी अमरीका के फ़ैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। फ्राँस और जर्मनी जैसे अमरीका के नाटो सहयोगियों ने ट्रम्प नीति का समर्थन करने से इंकार कर दिया।   

फिलिस्तीनी अधिकारियों ने सबसे कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इस फ़ैसले को शांति प्रक्रिया में अतिरिक्त अड़चन करार दिया। इतना ही नहीं अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने फिलिस्तीनी राष्ट्रपति की हालिया यात्रा के दौरान उन से मुलाक़ात नहीं की और राष्ट्रपति के ट्वीट को ऐतिहासिक तथा साहसिक बताया। इस से फिलिस्तीन नागरिक नाराज़ हो गए।  

हालांकि इस समय अमरीका के फ़ैसले के प्रभाव का आकलन करना जल्दबाज़ी होगी। गृह युद्ध जैसे हालात में सीरिया इस्राइल के साथ युद्ध मोल नहीं ले सकता। हाल ही में क्रिमिया को ख़ुद में मिलाने वाला रूस भी नैतिक आधार पर बहुत अधिक कुछ नहीं कह सकता। सऊदी और ईरान के शीत युद्ध और बहुत से अरब देशों की आंतरिक स्थिति अमरीकी फ़ैसले पर एकीकृत अरब प्रतिक्रिया शायद न ही तैयार होने दे।  

लेकिन फिर भी अधिकृत भू-भाग को मान्यता देने से अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों पर बुरा असर पड़ता है। भारत फ़िलिस्तीनी हित का साथ देता आया है, पश्चिम एशिया में शांति प्रक्रिया का समर्थन करता है और सभी प्रकार के विवादों को सुलझाने  के लिए शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांत को बनाए रखना चाहता है।

भारत ने भले ही इस्राइल के साथ अपने रक्षा और सुरक्षा संबंध बेहतर किए हैं लेकिन फिर भी ये फिलिस्तीन के विचार का समर्थन करता है और सीरिया सहित अरब देशों और इस्राइल के बीच सभी तरह के विवादों के शातिंपूर्ण समाधान का समर्थन करता है।  

आलेख- प्रो. चिंतामणि माहापात्रा, प्रो. वी.सी., जेएनयू

अनुवाद- नीलम मलकानिया