16.05.2019

आज के लगभग सभी समाचार पत्रों ने बंगाल की चुनावी हिंसा को लेकर संपादकीय टिप्पणियाँ की हैं | जबकि अन्य समाचार पत्रों ने अन्य विषयों को संपादकीय का विषय बनाया है | वहीं समाचार पत्रों की सुर्खियां भी ध्यान आकर्षित करती हैं | पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा से नाराज़ चुनाव आयोग की सख्त कार्रवाई आज के सभी अख़बारों की पहली बड़ी ख़बर है। अमर उजाला की सुर्खी है- चुनाव आयोग का सख्त फैसला। गृह सचिव और एडीजी को हटाया। राष्ट्रीय सहारा के शब्द हैं- कोलकाता हिंसा के बाद चुनाव आयोग का ऐतिहासिक फैसला। बंगाल में प्रचार एक दिन पहले ही बंद। आर्मड फोर्सेज़ स्पेशल ऑप्रेशन्स डिविज़न के पहले मुखिया होंगे- मेजर जनरल ए.के. ढींगरा। दैनिक भास्कर के अनुसार जल-थल-नभ तीनों में दुश्मन को घुसकर मारेगी त्रिसेना।

दक्षिण-पश्चिम मानसून के इस साल कुछ देरी से पहुंचने के मौसम विभाग के अनुमान को भी अधिकांश अख़बारों ने पहले पन्ने पर दिया है। नवभारत टाइम्स ने इसे बॉक्स में देते हुए लिखा है- मॉनसून एक्सप्रेस अब और लेट। केरल में छह जून को एंट्री।

2041 के लिए दिल्ली के मास्टर प्लान के बारे में दैनिक जागरण ने लिखा है- दिल्ली वासियों की राय लेकर डीडीए तैयार करेगा विकास का खाका। लंदन, तोक्यो, सिंगापुर की तर्ज़ पर बढ़ाया जाएगा दिल्ली का हरित क्षेत्र।

हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड की 12वीं कक्षा के परिणामों पर हिंदुस्तान ने मिसाल बने मेधावी शीर्षक से लिखा है- राजमिस्त्री का बेटा 12वीं कक्षा का टॉपर।

नई टेक्नोलॉजी न सीखने पर छंटनी का खतरा इकोनामिक टाइम्स में है। पत्र का कहना है- सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के सामने चैलेंज- नई चीज़ें सीखो या निकलो।

हिन्दी दैनिक नवभारत टाइम्स “यह किसका बंगाल” शीर्षक से अपने संपादकीय में लिखता है कि अभी जब देश भर से चुनावी हिंसा की विदाई होती दिख रही है, तब मंगलवार को पश्चिम बंगाल में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान हुए उपद्रव ने सबकी चिंता बढ़ा दी है। इस घटना ने एक बार फिर अस्सी के दशक की याद दिला दी है, जब इलेक्शन के समय खासकर बिहार से हत्या, मारपीट, बूथ लूट और हंगामे की ख़बरें आती थीं। इस बार पश्चिम बंगाल से लोकसभा चुनाव के हर चरण में हिंसा की ख़बरें आई हैं। कुछ समय पहले पंचायत चुनाव के दौरान भी भारी हिंसा हुई थी। बीते मंगलवार की घटना में बीजेपी और टीएमसी के कार्यकर्ताओं के बीच टकराव हुआ और लड़ाई-झगड़े के बीच प्रसिद्ध समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति चकनाचूर हो गई। इसके लिए बीजेपी और टीएमसी दोनों एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रही हैं। बंगाल अपनी समृद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जाना जाता रहा है। पिछले दो सौ वर्षों में उसने कई बार देश को दिशा दिखाई है। राजनीतिक हिंसा ऐसे सुसंस्कृत राज्य की पहचान बन जाना क्षोभ और आश्चर्य का विषय है। वैसे, बंगाली जनमानस में अपने विचारों को लेकर मर-मिटने का भाव शुरू से रहा है। ब्रिटिश शासन के दौरान वहां राष्ट्रवाद की लहर मजबूत हुई तो किशोर वय के कई क्रांतिकारी सामने आए जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोध में आत्म बलिदान की एक श्रृंखला रच दी। आजादी के बाद यह आदर्शवाद सबसे ज्यादा उग्र वाम विचारों में प्रतिबिंबित हुआ। दुर्भाग्यवश, विचार के प्रति उस रूमानी लगाव को एक नई रचनात्मक ऊर्जा में रूपांतरित नहीं किया जा सका और धीरे-धीरे यह सत्ता से जुड़ी वैचारिक कट्टरता में बदलता गया। विरोधी विचार को सहन न करने और उसे हिंसक तरीके से दबाने की प्रवृत्ति सबसे पहले 1990 के दशक में देखने को मिली, हालांकि चुनावी मंचों से लेफ्ट के 30 सालों के शासन में 28 हजार राजनीतिक हत्याओं का आंकड़ा बताया जाता रहा है। हिंसा के ज्यादातर शिकार विरोधी दलों के कार्यकर्ता ही हुए। कम्युनिस्ट शासन के दौरान ममता बनर्जी को बालों से पकड़ कर राज्य सचिवालय से बाहर फिंकवाए जाने की कहानियां भी कही जाती रही हैं।

      समाचार पत्र दैनिक भास्कर “क्या आयोग इस चुनाव से कुछ सीख लेगा, साख बनाएगा  ?” शीर्षक से अपने संपादकीय में लिखता है कि चुनाव आयोग को 17 वीं लोकसभा के इस चुनाव को आगामी चुनाव में केस स्टडी की तरह लेना चाहिए ? क्या लोकसभा के चुनाव सात चरणों में होने चाहिए ? इस बार चुनाव में गाली-गलौज, वाद-विवाद, तर्क-वितर्क, मारपीट और तोड़फोड़ की घटनाओं को देखने से शायद यही स्पष्ट होता है कि चुनाव तीन या चार दौर से लंबे नहीं होने चाहिए | लंबे दौर के इस चुनाव कार्यक्रम की वजह से प्रधानमंत्री और राहुल गांधी जैसे नेताओं को एक-एक राज्य में दस से बारह चुनावी सभाएं, रोड शो करने का अवसर मिला | स्थानीय नेता तो हर संसदीय क्षेत्र में दो से चार सभाएं करने में क़ामयाब हो गए | जितना लंबा समय उतना ही दुरुपयोग |

आलेख – हिन्दी एकांश, विदेश प्रसारण सेवा