24.05.2019

 आज के समाचार पत्रों ने 17वीं लोकसभा चुनावों के साथ चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों को लेकर संपादकीय टिप्पणियां की हैं |

लोकसभा और चार राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव परिणाम अख़बारों की बड़ी ख़बर है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन एनडीए को लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल होने पर जनसत्ता ने प्रधानमंत्री के हवाले से लिखा है-शुक्रिया भारत, नम्रता से और लोकतंत्र की मर्यादा से है चलना। हिन्दुस्तान के शब्द है महाविजेता मोदी। बिहार, बंगाल, राजस्थान, मध्य प्रदेश में परचम, यूपी में महागठबंधन के बावजूद बड़ी जीत।  

मज़बूत राष्ट्र के लिएशीर्षक से नवभारत टाइम्स अपने सम्पादकीय में लिखता है कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत सुनिश्चित करके भारतीय मतदाता ने एक ऐसी मज़बूत सरकार के लिए जनादेश दिया है, जो आतंकवाद और सुरक्षा के मुद्दों पर सख्त फैसले ले सके। इस क्रम में बीजेपी अकेले दम पर अपना एक कार्यकाल पूरा करके दूसरी बार सत्ता में आने वाली पहली गैर-कांग्रेसी पार्टी बन गई है। नेहरू युग के बाद किसी प्रधानमंत्री के पक्ष में जनता ने ऐसा भरोसा पहली बार ही दिखाया है। याद करें तो नरेंद्र मोदी से पहले यह गौरव इंदिरा गांधी को भी नहीं हासिल हो पाया था। 

न सिर्फ बीजेपी बल्कि उसके तमाम सहयोगी दलों ने मोदी के नाम पर ही वोट मांगे। दरअसल, भारत में एक मज़बूत नेता की छवि लोगों के लिए काफी मायने रखती है। मोदी के बरक्स विपक्ष का कोई भी नेता मतदाताओं की इस कसौटी पर खरा नहीं उतर सका। पिछले पांच सालों में सरकार की कई नीतियों पर विपक्ष ने सवाल उठाए, उसके कुछ कदमों का प्रबल विरोध हुआ लेकिन इसके बावजूद सरकार के प्रति लोगों का भरोसा नहीं टूटा।

“इतिहास का पन्ना” शीर्षक से जनसत्ता अपने सम्पादकीय में लिखता है कि यह पहली बार है, जब किसी ग़ैर-कांग्रेसी सरकार ने केंद्र में दुबारा बहुमत हासिल किया है | तमाम आकलनों, अनुमानों को निर्मूल साबित करते हुए भाजपा ने दूसरी बार अपने दम पर बहुमत हासिल कर लिया है | हालांकि मतदान पश्चात् सर्वेक्षणों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को तीन सौ से चार सौ के बीच सीटें आने के संकेत मिले थे, पर बहुत सारे लोग उन्हें सही नहीं मान रहे थे | इसका आधार सिर्फ यह था कि इस बात पर किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि भाजपा अपना पिछला मत प्रतिशत कायम रख पायेगी | क्योंकि पिछले आम चुनाव में उसे सत्ता-विरोधी लहर का फायदा मिला था | कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार से लोगों में नाराज़गी थी | इस बार वैसी कोई लहर नहीं थी, बल्कि सत्ता के पक्ष में भी कोई लहर नज़र नहीं आ रही थी | नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों से सरकार के प्रति लोगों में व्यापक नाराज़गी का अनुमान लगाया जा रहा था | फिर विपक्षी दलों ने इस बार कुछ अधिक ताक़त के साथ अपने को चुनाव मैदान में उतारा था | क्षेत्रीय दलों से कड़ी चुनौती मानी जा रही थी | इसके     अलावा उन राज्यों में भाजपा के नुक्सान का अनुमान लगाया जा रहा था, जहाँ पिछली बार उसने सारी की सारी या फिर अधिकतम सीटों पर जीत हासिल की थी| खासकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में बड़े नुक्सान के कयास थे | हालांकि यहाँ हुए नुकसान की कुछ भरपाई पश्चिम बंगाल और ओडिशा से होने की उम्मीद की जा रही थी | इन सबके बीच कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को अच्छा-खासा फायदा मिलने का अनुमान लगाया जा रहा था | मगर नतीजों ने इन तमाम आकलनों पर पानी फेर दिया |