11.07.2019

आज के हिंदी समाचार पत्रों ने विभिन्न विषयों पर संपादकीय लेख लिखे हैं। साथ ही समाचारों की सुर्खियों ने भी प्रमुख पृष्ठ पर स्थान पाया है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले, कर्नाटक का घटनाक्रम और क्रिकेट विश्व कप अख़बारों की बड़ी सुर्खी हैं। यौन अपराध संरक्षण कानून पॉक्सो में ज़रूरी संशोधनों की मंज़ूरी पर हिंदुस्तान लिखता है-बच्चों के यौन शोषण पर फांसी की सज़ा मिलेगी। श्रमिकों के लिए नए विधेयक को हरिभूमि ने अहमियत दी है – मज़दूरों को नियुक्ति पत्र और हर महीने स्वास्थ्य जांच का प्रावधान।

कर्नाटक का राजनीतिक माहौल जनसत्ता सहित सभी अख़बारों की प्रमुख ख़बर है। पत्र लिखता है – कांग्रेस के और दो विधायकों के इस्तीफे से गहराया सियासी संकट।

राजस्थान पत्रिका के अनुसार कर्नाटक के बाद अब गोआ में भी कांग्रेस को बड़ा झटका। पार्टी के 15 में से 10 विधायक भाजपा में गए।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर के समर यूनिवर्सिटी गेम्स में दुती चंद ने 100 मीटर दौड़ में गोल्ड अपने नाम किया, इस उपलब्धि पर नवभारत टाइम्स लिखता है- देश ने पहली बार पार की यह लाइन।

क्रिकेट विश्वकप सेमी फाइनल में भारत की हार पर दैनिक ट्रिब्यून के शब्द हैं- ढेर हुए विराट शेर, टीम इंडिया बाहर, जडेजा की शानदार पारी और धोनी का अर्द्ध शतक भी नहीं आ पाया काम। अमर उजाला के अनुसार सेमी फाइनल में टॉप का फ्लॉप शो।

शिकायत होगी दूर, अक्तूबर से ट्रेन में आसानी से मिलेगी सीट, बकौल दैनिक जागरण हेड लाइन जेनरेशन तकनीक की सहायता से रेल में रोज़ाना चार लाख सीटें बढेंगी।

‘शांति की दिशा में’, इस संपादकीय शीर्षक से नवभारत टाइम्स लिखता है कि अफगानिस्तान सरकार, तालिबान और अफगान समाज के कुछ अन्य प्रतिनिधियों में अपने देश के भविष्य का एक खाका तैयार करने पर सहमति बन गई है। तालिबान हिंसात्मक गतिविधियां कम करने के लिए राज़ी हो गए हैं। कतर की राजधानी दोहा में हुई दो दिवसीय वार्ता के बाद मंगलवार को एक संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया गया जिसमें सभी पक्षों ने गृहयुद्ध समाप्त करने के लिए मिलकर काम करने की ज़रूरत पर बल दिया। इसके साथ ही राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में महिलाओं के बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित करने की बात भी कही।

जर्मनी और कतर के प्रयासों से हुई इस वार्ता में कुछ सरकारी अधिकारियों समेत अफगान प्रतिनिधिमंडल ने हिस्सा लिया था। हालांकि अफगान अधिकारी सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर इसमें शामिल नहीं हुए थे। अमेरिका ने कहा है कि सितंबर में अफगानिस्तान में राष्ट्रपति पद के चुनाव होने हैं, इससे पहले वह तालिबान के साथ एक राजनीतिक समझौता करना चाहता है, ताकि विदेशी सुरक्षा बलों की वापसी शुरू हो सके। समझौते का आधार यह है कि अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से सुरक्षित और शांतिपूर्वक निकल जाएगी लेकिन बदले में विद्रोहियों को गारंटी देनी होगी कि न तो वे अफगानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल अलकायदा जैसी बाहरी ताकतों को करने देंगे, न ही खुद दुनिया के बाकी हिस्सों के लिए ख़तरा बनेंगे।

शांति की दिशा में यह निश्चय ही एक अहम कदम है लेकिन आगे की राह अब भी आसान नहीं है। तालिबान वार्ता की मेज पर इसलिए आए हैं ताकि अपनी परंपरागत छवि से बाहर निकल सकें और अपने देश की मुख्यधारा की शक्ति के रूप में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त कर सकें। हालांकि यह भी सच है कि तालिबान लड़ाके 18 साल लंबी लड़ाई से थक चुके हैं और उन्हें आईएसआईएस जैसे संगठनों से चुनौती भी मिलने लगी है। तालिबान संगठन अफगान सरकार को मान्यता नहीं देता। वह उसे अमेरिका की कठपुतली सरकार बताता है और मौजूदा संविधान को स्वीकार नहीं करता। राष्ट्रपति अशरफ गनी ने देशवासियों को भरोसा दिया है कि अमन कायम करने के नाम पर उनके अधिकारों के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

देखना है, धुर-कट्टरपंथी तालिबान अपने मुल्क में जनतंत्र, मानवाधिकार, स्त्री स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों पर अपने पुराने रवैये में कितना बदलाव ला पाते हैं। सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि शांति प्रक्रिया अफगानिस्तान को फिर एक कठमुल्ले समाज की ओर न धकेल दे।

‘संकट और उम्मीद’ नामक संपादकीय शीर्षक से जनसत्ता का कहना है कि लंबे समय से नोएडा-ग्रेटर नोएडा में बड़े बिल्डरों और फ्लैट खरीदारों के बीच चला आ रहा विवाद अभी तक किसी ऐसे ठोस समाधान तक नहीं पहुंच पाया है जिससे खरीदारों को जल्दी अपने घर का कब्ज़ा मिलने का रास्ता साफ हो सके। मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है। बयालीस हज़ार से ज़्यादा खरीदारों को संकट में देख सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में अब तक काफी सख्त रुख दिखाया है। सर्वोच्च न्यायालय के दखल से फिलहाल इतना हुआ कि ग्राहकों से धोखाधड़ी करने वाले और अपने को दिवालिया बताने वाले बिल्डरों पर कानून का शिकंजा कसा। अदालत ने कई बिल्डरों से पैसा जमा करवाया और कुछ को जेल भी भिजवाया। लेकिन सर्वोच्च अदालत की इतनी सक्रियता और कड़ी कार्रवाई के बावजूद खरीदार खाली हाथ ही हैं।

अब सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार से कहा है कि वही कोई उपाय करे जिससे खरीदारों को जल्द ही फ्लैटों का कब्ज़ा दिलवाया जा सके। इसके लिए अदालत ने सरकार से ठोस व्यावहारिक प्रस्ताव बना कर देने को कहा है। अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। अब समस्या यह है कि अगर कोई बिल्डर कानूनी प्रक्रिया के तहत दिवालिया घोषित कर दिया जाता है तो सबसे पहले उसकी संपत्ति की बिक्री से बैंक अपना कर्ज वसूलेंगे। अदालत का रुख साफ है कि धोखेबाज बिल्डरों के खिलाफ कार्रवाई भी होगी और लोगों को उनके घर भी दिलवाए जाएंगे। पर यह संभव होगा कैसे, इसी का समाधान केंद्र को निकालना है।